4. परमेश्वर के कार्य के तीन चरण किस तरह क्रमशः गहनतर होते जाते हैं ताकि लोगों को बचाया जा सके और उन्हें परिपूर्ण किया जा सके?

4. परमेश्वर के कार्य के तीन चरण किस तरह क्रमशः गहनतर होते जाते हैं ताकि लोगों को बचाया जा सके और उन्हें परिपूर्ण किया जा सके?

  परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

  परमेश्वर के सम्पूर्ण प्रबंधन को तीन चरणों में विभाजित किया जाता है, और प्रत्येक चरण में, मनुष्य से यथोचित अपेक्षाएँ की जाती हैं। इसके अतिरिक्त, जैसे-जैसे युग बीतते और प्रगति करते जाते हैं, परमेश्वर की समस्त मनुष्यजाति से अपेक्षाएँ और अधिक ऊँची होती जाती हैं। इस प्रकार, कदम दर कदम, परमेश्वर का प्रबंधन अपने चरम पर पहुँच जाता है, जब तक कि मनुष्य “देह में वचन का प्रकटन” देख नहीं लेता है, और इस तरह मनुष्य से की गई अपेक्षाएँ और अधिक ऊँची हो जाती हैं, और गवाही देने की मनुष्य से अपेक्षाएँ और अधिक ऊँची हो जाती हैं। वह मनुष्य परमेश्वर के साथ सचमुच में सहयोग करने में जितना अधिक सक्षम होता है, उतना ही अधिक वह परमेश्वर को महिमा देता है। मनुष्य का सहयोग वह गवाही है जिसे देने की उससे अपेक्षा की जाती है, और जो वह गवाही देता है वह मनुष्य का व्यवहार है। और इसलिए, परमेश्वर के कार्य का उचित प्रभाव हो सकता है या नहीं, और सच्ची गवाही हो सकती है या नहीं, ये पेचीदा रूप से मनुष्य के सहयोग और गवाही से जुड़े हुए हैं। पढना जारी रखे

“परमेश्वर के काम का दर्शन” पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से संकलन भाग दो

  14. अपने सभी प्रबंधन में परमेश्वर का कार्य पूर्णतः स्पष्ट है: अनुग्रह का युग अनुग्रह का युग है, और अंत के दिन अंत के दिन हैं। प्रत्येक युग के बीच सुस्पष्ट अंतर हैं,क्योंकि हर युग में परमेश्वर कार्य करता है जो उस युग का प्रतिनिधित्व करता है। अंत के दिनों का कार्य किए जाने के लिए, युग का अंत लाने के लिए ज्वलन, न्याय, ताड़ना, कोप, और विनाश अवश्य होने चाहिए। अंत के दिन अंतिम युग को संदर्भित करते हैं। अंतिम युग के दौरान, क्या परमेश्वर युगका अंत नहीं लाएगा? युग को समाप्त करने के लिए, परमेश्वर को अपने साथ ताड़ना और न्याय अवश्य लाना चाहिए। केवल इसी तरह से वह युग को समाप्त कर सकता है। यीशु का प्रयोजन ऐसा था ताकि मनुष्य अस्तित्व में रहना जारी रख सके, जीवित रह सके, और एक बेहतर तरीके से विद्यमान रह सके। उसने मनुष्य को पाप से बचाया ताकि व्यक्ति निरंतर चरित्रहीनता को बंद कर देगा और अब अधोलोक और नरक में नहीं रहेगा, और उसने मनुष्य को अधोलोक और नरक से बचा कर मनुष्य को जीवित रहने दिया। अब, अंत के दिन आ गए हैं। वह मनुष्य का सर्वनाश कर देगा, मनुष्य को पूरी तरह से नष्ट कर देगा, जिसका अर्थ है कि वह मनुष्य की अवज्ञा को उलट देगा। वैसे तो, अतीत के परमेश्वर का करुणामय और प्रेममय स्वभाव युग को समाप्त करने में असमर्थ होगा, और परमेश्वर की छः-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना को पूरा करने में असमर्थ होगा। हर युग में परमेश्वर के स्वभाव का प्रतिनिधित्व विशिष्ट होता है, और हर युगमें वह कार्य समाविष्ट होता है जिसे परमेश्वर द्वारा किया जाना चाहिए। इसलिए, प्रत्येक युग में परमेश्वर स्वयं द्वारा किया गया कार्य उसके सच्चे स्वभाव की अभिव्यक्ति से युक्त होता है, और उसका नाम और वह जो कार्य करता है युग के साथ बदल जाते हैं;वे सभी नए होते हैं। पढना जारी रखे

3. परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों के बीच का पारस्परिक संबंध

  3. परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों के बीच का पारस्परिक संबंध  

  3. परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों के बीच का पारस्परिक संबंध

  परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

  यहोवा के कार्य से ले कर यीशु के कार्य तक, और यीशु के कार्य से लेकर इस वर्तमान चरण तक, ये तीन चरण परमेश्वर के प्रबंधन की पूर्ण परिसीमा को एक सतत सूत्र में आवृत करते हैं, और यह समस्त एक ही पवित्रात्मा का कार्य है। दुनिया के सृजन के बाद से, परमेश्वर हमेशा मनुष्यजाति का प्रबंधन करता आ रहा है। वही आरंभ और अंत है, वही प्रथम और अंतिम है, और वही एक है जो युग का आरंभ करता है और वही एक है जो युग का अंत करता है। कार्य के तीन चरण, विभिन्न युगों और विभिन्न स्थानों में, निश्चय ही एक ही पवित्रात्मा का कार्य हैं। वे सभी जो इन तीन चरणों को पृथक करते हैं, परमेश्वर के विरोध में खड़े हैं। पढना जारी रखे

“परमेश्वर के काम का दर्शन” पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से संकलन भाग दो

  14. अपने सभी प्रबंधन में परमेश्वर का कार्य पूर्णतः स्पष्ट है: अनुग्रह का युग अनुग्रह का युग है, और अंत के दिन अंत के दिन हैं। प्रत्येक युग के बीच सुस्पष्ट अंतर हैं,क्योंकि हर युग में परमेश्वर कार्य करता है जो उस युग का प्रतिनिधित्व करता है। अंत के दिनों का कार्य किए जाने के लिए, युग का अंत लाने के लिए ज्वलन, न्याय, ताड़ना, कोप, और विनाश अवश्य होने चाहिए। अंत के दिन अंतिम युग को संदर्भित करते हैं। अंतिम युग के दौरान, क्या परमेश्वर युगका अंत नहीं लाएगा? युग को समाप्त करने के लिए, परमेश्वर को अपने साथ ताड़ना और न्याय अवश्य लाना चाहिए। केवल इसी तरह से वह युग को समाप्त कर सकता है। यीशु का प्रयोजन ऐसा था ताकि मनुष्य अस्तित्व में रहना जारी रख सके, जीवित रह सके, और एक बेहतर तरीके से विद्यमान रह सके। उसने मनुष्य को पाप से बचाया ताकि व्यक्ति निरंतर चरित्रहीनता को बंद कर देगा और अब अधोलोक और नरक में नहीं रहेगा, और उसने मनुष्य को अधोलोक और नरक से बचा कर मनुष्य को जीवित रहने दिया। अब, अंत के दिन आ गए हैं। वह मनुष्य का सर्वनाश कर देगा, मनुष्य को पूरी तरह से नष्ट कर देगा, जिसका अर्थ है कि वह मनुष्य की अवज्ञा को उलट देगा। वैसे तो, अतीत के परमेश्वर का करुणामय और प्रेममय स्वभाव युग को समाप्त करने में असमर्थ होगा, और परमेश्वर की छः-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना को पूरा करने में असमर्थ होगा। हर युग में परमेश्वर के स्वभाव का प्रतिनिधित्व विशिष्ट होता है, और हर युगमें वह कार्य समाविष्ट होता है जिसे परमेश्वर द्वारा किया जाना चाहिए। इसलिए, प्रत्येक युग में परमेश्वर स्वयं द्वारा किया गया कार्य उसके सच्चे स्वभाव की अभिव्यक्ति से युक्त होता है, और उसका नाम और वह जो कार्य करता है युग के साथ बदल जाते हैं;वे सभी नए होते हैं। पढना जारी रखे

2. परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों में से प्रत्येक के उद्देश्य और महत्व

  2. परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों में से प्रत्येक के उद्देश्य और महत्व

  (1) व्यवस्था के युग में परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य और महत्व

  परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

  वह कार्य जो यहोवा ने इस्राएलियों पर किया, उसने मानवजाति के बीच पृथ्वी पर परमेश्वर के मूल स्थान को स्थापित किया जो कि वह पवित्र स्थान भी था जहाँ वह उपस्थित रहता था। उसने अपने कार्य को इस्राएल के लोगों तक ही सीमित रखा। आरम्भ में, उसने इस्राएल के बाहर कार्य नहीं किया; उसके बजाए, उसने ऐसे लोगों को चुना जिन्हें उसने अपने कार्यक्षेत्र को सीमित रखने के लिए उचित पाया। इस्राएल वह जगह है जहाँ परमेश्वर ने आदम और हव्वा की रचना की, और उस जगह की धूल से यहोवा ने मनुष्य को बनाया; यह स्थान पृथ्वी पर उसके कार्य का आधार बन गया। इस्राएली, जो नूह के वंशज थे, और आदम के भी वंशज थे, पृथ्वी पर यहोवा के कार्य की मानवीय बुनियाद थे। पढना जारी रखे

“परमेश्वर के काम का दर्शन” पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से संकलन भाग एक

  1. यूहन्ना ने, यीशु के बपतिस्मा के सात वर्ष पहले से स्वर्गराज्य के सुसमाचार को फैलाना शुरू कर दिया था। लोगों को उसका किया गया काम यीशु के अनुवर्ती काम से ऊँचा लगता था, फिर भी, वह था तो केवल एक नबी ही। वे मंदिर के भीतर बात या काम नहीं करते था, बल्कि इसके बाहर के कस्बों और गांवों में ऐसा करते था। उसने, निश्चय ही यह यहूदी राष्ट्र के बीच किया, विशेष रूप से उन के बीच जो गरीब थे। यूहन्ना, समाज की ऊपरी श्रेणी के लोगों के संपर्क में कम ही आया, वो केवल यहूदिया के आम लोगों के बीच सुसमाचार फैलाता रहा ताकि प्रभु यीशु के लिए उचित लोगों को तैयार कर सके, और उसके लिए काम करने की उपयुक्त जगह तैयार कर सके। मार्ग प्रशस्त करने के लिए, यूहन्ना जैसे एक नबी के होने के कारण, प्रभु यीशु आने के साथ ही सीधे अपने क्रूस के रास्ते पर चलने में सक्षम हुआ। जब परमेश्वर ने अपना काम करने के लिए शरीर धारण किया, तो उसे लोगों को चुनने का काम करने की ज़रूरत नहीं थी, और व्यक्तिगत रूप से लोगों को या काम करने की जगह तलाशने की आवश्यकता नहीं थी। जब वह आया तो उसने ऐसा काम नहीं किया; उसके आने के पहले ही उचित व्यक्ति ने तैयारी कर दी थी। … पढना जारी रखे

1. मानव जाति के प्रबंधन से सम्बंधित परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों के उद्देश्य को जानो।

  1. मानव जाति के प्रबंधन से सम्बंधित परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों के उद्देश्य को जानो।

  परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

  मेरी सम्पूर्ण प्रबन्धन योजना, ऐसी योजना जो छः हज़ार सालों तक फैली हुई है, तीन चरणों या तीन युगों को शामिल करती हैः आरंभ में व्यवस्था का युग; अनुग्रह का युग (जो छुटकारे का युग भी है); और अंत के दिनों में राज्य का युग। प्रत्येक युग की प्रकृति के अनुसार मेरा कार्य इन तीनों युगों में तत्वतः अलग-अलग है, परन्तु प्रत्येक चरण में यह मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप है—या बल्कि, अधिक स्पष्ट कहें तो, यह उन छलकपटों के अनुसार किया जाता है जो शैतान उस युद्ध में काम में लाता है जो मैं उसके विरुद्ध शुरू करता हूँ। मेरे कार्य का उद्धेश्य शैतान को हराना, अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को व्यक्त करना, शैतान के सभी छलकपटों को उजागर करना और परिणामस्वरूप समस्त मानवजाति को बचाना है, जो उसके अधिकार क्षेत्र के अधीन रहती है। पढना जारी रखे

“जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य” पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन

  18. जब परमेश्वर ने अपने दो चरणों का कार्य इज़राइल में किया, तो इज़राइलियों और गैर-यहूदी जातियों ने समान रूप से यह धारणा अपना ली: यद्यपि यह सत्य है कि परमेश्वर ने सभी चीज़ें बनाई हैं, वह केवल इज़राइलियों का परमेश्वर बनने को तैयार है, गैर-यहूदियों का परमेश्वर नहीं। इज़राइली निम्नलिखित पर विश्वास करते हैं: परमेश्वर केवल हमारा परमेश्वर हो सकता है, तुम सभी गैर-यहूदियों का परमेश्वर नहीं, और क्योंकि तुम लोग यहोवा को नहीं मानते हो, यहोवा—हमारा परमेश्वर—तुम लोगों से घृणा करता है। इसके अतिरिक्त, उन यहुदियों का यह भी मानना है: प्रभु यीशु ने हम यहूदियों की छवि ग्रहण की थी और यह एक ऐसा परमेश्वर है जिस पर यहूदियों का चिन्ह उपस्थित है। हमारे बीच ही परमेश्वर कार्य करता है। परमेश्वर की छवि और हमारी छवि समान हैं; हमारी छवि परमेश्वर के करीब है। प्रभु यीशु हम यहूदियों का राजा है; अन्य जातियाँ ऐसा महान उद्धार प्राप्त करने के योग्य नहीं हैं। प्रभु यीशु हम यहूदियों के लिए पापबलि है। कार्य के केवल इन दो चरणों के आधार पर ही इज़राइलियों और यहूदियों ने कई धारणाएं बना ली थीं। वे रोब से स्वयं के लिए परमेश्वर पर दावा करते हैं, और मानते नहीं हैं कि परमेश्वर गैर-यहूदी जातियों का भी परमेश्वर है। पढना जारी रखे

10. यह क्यों है कि केवल देह-धारी परमेश्वर के कार्य के अनुभव और आज्ञा-पालन करने के द्वारा ही कोई परमेश्वर को जान सकता है?

  10. यह क्यों है कि केवल देह-धारी परमेश्वर के कार्य के अनुभव और आज्ञा-पालन करने के द्वारा ही कोई परमेश्वर को जान सकता है?

  संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

  ”और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्‍चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उसकी ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा” (युहन्‍ना 1:14)।

  ”मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता। यदि तुम ने मुझे जाना होता, तो मेरे पिता को भी जानते; और अब उसे जानते हो, और उसे देखा भी है” (युहन्‍ना 14:6-7)।

  ”मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में है …” (युहन्‍ना 14:10)।

  ”मैं और पिता एक हैं” (युहन्‍ना 10:30)। पढना जारी रखे

“जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य” पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो भाग दो

  9. आज तुम्हें मालूम होना चाहिये कि तुम पर विजय कैसे हो, और लोग खुद पर विजय उपरांत अपना आचरण कैसा रखते हैं। तुम यह कह सकते हो कि तुम पर विजय पा ली गयी है, पर क्या तुम मृत्युपर्यंत आज्ञाकारी रहोगे? संभावनाओं की परवाह किए बगैर तुम में पूरे अंत तक अनुसरण करने की क्षमता होनी चाहिए और तुम्हें किसी भी परिस्थिति में परमेश्वर पर विश्वास नहीं खोना चाहिए। अतंतः तुम्हें गवाही के दो पक्ष प्राप्त करने हैं: अय्यूब की गवाही-मृत्यु तक आज्ञाकारिता और पतरस की गवाही – परमेश्वर का सर्वोच्च प्रेम। एक मामले में तुम्हें अय्यूब की तरह होना चाहिए, उसके पास कुछ भी सांसारिक संसाधन नहीं थे और शारीरिक पीड़ा से वह घिरा हुआ था, तब भी उसने यहोवा का नाम नहीं त्यागा। यह अय्यूब की गवाही थी। पतरस ने मृत्यु तक परमेश्वर से प्रेम रखा। जब वह मरा – जब उस क्रूस पर चढ़ाया गया – तब भी उसने परमेश्वर से प्रेम किया, उसने अपने हित या महिमामयी आशा की या अनावश्यक विचारों को स्थान नहीं दिया, और केवल परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर की व्यवस्था को पूर्णतः मानने की ही इच्छा की। गवाही देने के लिए विचार किये जाने से पूर्व तुम्हें ऐसा स्तर हासिल करना होगा, इस से पहले कि तुम ऐसे व्यक्ति बन जाओ जो विजय प्राप्त करने के बाद, पूर्णबनाया गया है। आज लोग यदि अपने सार तत्व को और अपने स्तर को सचमुच जानते तो क्या वे तब भी संभावनाओं और आशा को खोजते? जो तुम्हें मालूम होना चाहिए वह यह है किः परमेश्वर मुझे पूर्ण करे या ना करे मैं परमेश्वर के पीछे चलूंगा, जो कुछ उसने अभी किया है, वह हमारे लिए किया है, और वह अच्छा है ताकि हमारा स्वभाव परिवर्तित हो और हम शैतान के चंगुल से छूट जाएं, यह कि, अपवित्र धरती पर रहने के बावजूद हम अशुद्धता से मुक्त हो जायें, गंदगी और शैतान के प्रभाव को झटक कर हम शैतान के प्रभाव को पीछे छोड़ने की क्षमता प्राप्त कर लें। पढना जारी रखे