5. अंतिम दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य को धार्मिक दुनिया द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने का प्रभाव और परिणाम

अंत के दिनों का न्याय

  परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

  अंत के दिनों का मसीह जीवन लेकर आता है, और सत्य का स्थायी एवं अनन्त मार्ग प्रदान करता है। इसी सत्य के मार्ग के द्वारा मनुष्य जीवन को प्राप्त करेगा, और एक मात्र इसी मार्ग से मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करेगा। यदि तुम अंत के दिनों के मसीह के द्वारा प्रदान किए गए जीवन के मार्ग को नहीं खोजते हो, तो तुम कभी भी यीशु के अनुमोदन को प्राप्त नहीं कर पाओगे और कभी भी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं बन पाओगे क्योंकि तुम इतिहास के कठपुतली और कैदी दोनों हो। जो लोग नियमों, लिखे गये पत्रों के नियंत्रण में हैं और इतिहास की ज़ंजीरों में जकड़े हुए हैं वे कभी भी जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, और कभी भी सतत जीवन के मार्ग को प्राप्त करने के योग्य नहीं बन सकते हैं। क्योंकि सिंहासन से प्रवाहित होने वाले जीवन जल की अपेक्षा, उनके पास मैला पानी है जिससे वे हज़ारों सालों से चिपके हुए हैं। जिनके पास जीवन का जल नहीं है वे हमेशा के लिए एक लाश, शैतान के खेलने की वस्तु और नरक की संतान बन रहेंगे। पढना जारी रखे

“कार्य और प्रवेश” पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग चार

  25. परमेश्वर आज मनुष्यों के विचारों और उनके आत्माओं को, और साथ ही उनके दिलों में हजारों सालों से रही परमेश्वर की छवि को, बदलने के उद्देश्य से उनके बीच आता है। इस अवसर के माध्यम से, वह मनुष्य को पूर्ण बनाएगा। अर्थात, वह मनुष्यों के ज्ञान के माध्यम से, वे जिस तरह से उसके बारे में जानकारी पाते हैं और उसके प्रति उनका जो दृष्टिकोण है, उन्हें बदल देगा, ताकि परमेश्वर के बारे में उनका ज्ञान एक नए सिरे से शुरू हो सके, और उनके दिल इसके माध्यम से नवीकृत और परिवर्तित हो सकें। निपटना और अनुशासन साधन हैं, जबकि विजय और नवीकरण लक्ष्य हैं। मनुष्य ने एक अस्पष्ट परमेश्वर के बारे में जिन अंधविश्वासी विचारों को पकड़ रखा है, उन्हें दूर करना हमेशा परमेश्वर का इरादा रहा है, और हाल ही में उसके लिए यह एक तत्कालिक आवश्यकता का मुद्दा बन गया है। मुझे आशा है कि सभी लोग इस पर आगे चिंतन करेंगे। प्रत्येक व्यक्ति कैसे अनुभव करता है इसे बदलो, ताकि परमेश्वर का यह अत्यावश्यक इरादा जल्द ही पूरा किया जा सके और पृथ्वी पर परमेश्वर के काम का अंतिम चरण एक फलदायी निष्कर्ष पर लाया जा सके। तुम सब की वफादारी को वैसे दिखाओ जैसे कि तुम लोगों को इसे दिखाना चाहिए, और एक अंतिम बार परमेश्वर के दिल को सकून दे दो। मुझे आशा है कि भाइयों और बहनों में से कोई भी इस जिम्मेदारी से जी नहीं चुराएगा या केवल दिखावे के लिए हाथ-पैर नहीं हिलाएगा। पढना जारी रखे

4. अंतिम दिनों में परमेश्वर के न्याय के महत्व को, अंतिम दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य से प्राप्त परिणामों में, देखा जा सकता है

  (1) अंत के दिनों में परमेश्वर का न्याय का कार्य मनुष्य को शुद्ध करने, बचाने और सिद्ध बनाने, तथा विजय प्राप्त करने वालों का एक समूह बनाने के लिए किया जाता है

  संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

  ”तू ने मेरे धीरज के वचन को थामा है, इसलिये मैं भी तुझे परीक्षा के उस समय बचा रखूँगा जो पृथ्वी पर रहनेवालों के परखने के लिये सारे संसार पर आनेवाला है। मैं शीघ्र ही आनेवाला हूँ; जो कुछ तेरे पास है उसे थामे रह कि कोई तेरा मुकुट छीन न ले। जो जय पाए उसे मैं अपने परमेश्‍वर के मन्दिर में एक खंभा बनाऊँगा, और वह फिर कभी बाहर न निकलेगा; और मैं अपने परमेश्‍वर का नाम और अपने परमेश्‍वर के नगर अर्थात् नये यरूशलेम का नाम, जो मेरे परमेश्‍वर के पास से स्वर्ग पर से उतरनेवाला है, और अपना नया नाम उस पर लिखूँगा” (प्रकाशितवाक्य 3:10-12)।

  ”ये वे हैं जो स्त्रियों के साथ अशुद्ध नहीं हुए, पर कुँवारे हैं; ये वे ही हैं कि जहाँ कहीं मेम्ना जाता है, वे उसके पीछे हो लेते हैं; ये तो परमेश्‍वर के निमित्त पहले फल होने के लिये मनुष्यों में से मोल लिए गए हैं। उनके मुँह से कभी झूठ न निकला था, वे निर्दोष हैं” (प्रकाशितवाक्य 14:4-5)। पढना जारी रखे

“कार्य और प्रवेश” पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन

  15. पुरुषों के बीच में शायद ही कोई परमेश्वर के हृदय की तीव्र इच्छा को समझता है क्योंकि लोगों की क्षमता बहुत कम है और उनकी आध्यात्मिक संवेदनशीलता काफी सुस्त है, और क्योंकि वे सभी न तो देखते हैं और न ही ध्यान देते हैं कि परमेश्वर क्या कर रहा है। इसलिए परमेश्वर मनुष्य के बारे में चिंता करता रहता है, मानो कि मनुष्य की पाशविक प्रकृति किसी भी क्षण बाहर आ सकती हो। यह आगे दर्शाता है कि परमेश्वर का पृथ्वी पर आना बड़े प्रलोभनों के साथ-साथ है। किन्तु लोगों के एक समूह को पूरा करने के वास्ते, महिमा से लदे हुए, परमेश्वर ने मनुष्य को अपने हर अभिप्राय के बारे में, कुछ भी नहीं छिपाते हुए, बता दिया। उसने लोगों के इस समूह को पूरा करने के लिए दृढ़ता से संकल्प किया है। इसलिए, कठिनाई आए या प्रलोभन, वह नज़र फेर लेता है और इस सभी को अनदेखा करता है। वह केवल चुपचाप अपना स्वयं का कार्य करता है, और दृढ़ता से यह विश्वास करता है कि एक दिन जब परमेश्वर महिमा प्राप्त कर लेगा, तो आदमी परमेश्वर को जान लेगा, और यह विश्वास करता है कि जब मनुष्य परमेश्वर के द्वारा पूरा कर लिया जाएगा, तो वह परमेश्वर के हृदय को पूरी तरह से समझ जाएगा। पढना जारी रखे

3. अंतिम दिनों में परमेश्वर के न्याय का कार्य किस तरह मानवजाति को शुद्ध करता और बचाता है?

  संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

  ”यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता; क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ। जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा” (यूहन्ना 12:47-48)।

  ”मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा” (यूहन्ना 16:12-13)। पढना जारी रखे

“कार्य और प्रवेश” पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो

  9. परमेश्वर ने मनुष्यों को बहुत कुछ सौंपा है और अनगिनत प्रकार से उनके प्रवेश को संबोधित किया है। परंतु क्योंकि लोगों की क्षमता बहुत कम है, इसलिए परमेश्वर के बहुत सारे वचन जड़ पकड़ने में असफल रहे हैं। क्षमता के कम होने के विभिन्न कारण हैं, जैसे कि मनुष्य के विचार और नैतिकता की भ्रष्टता, और उचित पालन-पोषण की कमी; सामंती अंधविश्वास जिन्होंने मनुष्य के हृदय को बुरी तरह से जकड़ लिया है; भ्रष्ट और पतनशील जीवन-शैलियाँ जिन्होंने मनुष्य के हृदय की गहराई में कई बुराइयों को स्थापित कर दिया है; सांस्कृतिक ज्ञान की सतही समझ, लगभग अठानवे प्रतिशत लोगों में सांस्कृतिक ज्ञान की शिक्षा की कमी और यही नहीं, बहुत कम लोगों का उच्च-स्तर की सांस्कृतिक शिक्षा को प्राप्त करना, इसलिए मूल रूप से लोगों को यह पता ही नहीं है कि परमेश्वर या पवित्र आत्मा का क्या अर्थ है, परंतु उनके पास सामंती अंधविश्वासों से प्राप्त परमेश्वर की केवल एक धुंधली और अस्पष्ट तस्वीर है; वे घातक प्रभाव जो हज़ारों वर्षो की “राष्ट्रवाद की अभिमानी आत्मा” द्वारा मनुष्य के हृदय की गहराई में छोड़े गए तथा सामंती विचारधारा जिसके द्वारा लोग बिना स्वतंत्रता के, महत्वकांक्षा रखने और आगे बढ़ने की इच्छा के बिना, प्रगति करने की अभिलाषा के बिना, बल्कि निष्क्रिय रहने और पीछे की ओर जाने और गुलाम मानसिकता से घिरे होने के कारण बंधे और जकड़े हुए हैं। ऐसी कई और बातों के साथ भी। पढना जारी रखे

2. अंतिम दिनों में परमेश्वर के न्याय का कार्य महान श्वेत सिंहासन का न्याय है, जिसकी प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में भविष्यवाणी की गई है

  संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

  ”क्योंकि वह समय आ पहुँचा है कि पहले परमेश्‍वर के लोगों का न्याय किया जाए” (1 पतरस 4:17)।

  ”फिर मैं ने एक बड़ा श्‍वेत सिंहासन और उसको, जो उस पर बैठा हुआ है, देखा; उसके सामने से पृथ्वी और आकाश भाग गए, और उनके लिये जगह न मिली। फिर मैं ने छोटे बड़े सब मरे हुओं को सिंहासन के सामने खड़े हुए देखा, और पुस्तकें खोली गईं; और फिर एक और पुस्तक खोली गई, अर्थात् जीवन की पुस्तक; और जैसा उन पुस्तकों में लिखा हुआ था, वैसे ही उनके कामों के अनुसार मरे हुओं का न्याय किया गया। समुद्र ने उन मरे हुओं को जो उसमें थे दे दिया, और मृत्यु और अधोलोक ने उन मरे हुओं को जो उनमें थे दे दिया; और उन में से हर एक के कामों के अनुसार उनका न्याय किया गया। मृत्यु और अधोलोक आग की झील में डाले गए। यह आग की झील दूसरी मृत्यु है; और जिस किसी का नाम जीवन की पुस्तक में लिखा हुआ न मिला, वह आग की झील में डाला गया” (प्रकाशितवाक्य 20:11-15)। पढना जारी रखे

“कार्य और प्रवेश” पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक

  1. जब से लोगों ने जीवन के सही मार्ग पर चलना शुरू किया, ऐसी कई चीजें हैं जिनके बारे में वे अस्पष्ट रहेहैं। वे परमेश्वर के कार्य के विषय में तथा उन्हें कितना कार्य करना चाहिए,इस विषय में पूर्ण रीति से भ्रम में हैं। एक ओर, यह उनके अनुभव की कमी के कारण और उनकी ग्रहण करने की क्षमता सीमित होने के कारण है; दूसरी ओर, यह इसलिए है कि परमेश्वर के कार्य ने लोगों को अभी तक इस अवस्था में नहीं पहुँचाया है। इसलिए, हर कोई अधिकांश आत्मिक विषयों के बारे में अस्पष्ट है। न केवल तुम लोग इस बारे में अस्पष्ट हो कि तुम्हें किस में प्रवेश करना चाहिए; बल्कि तुम लोग परमेश्वर के कार्य के बारे में भी अनजान हो। यह तुम्हारे भीतर केवल कमियों की बात नहीं है: यह उन सभी का बहुत बड़ा दोष है जो धार्मिक जगत से संबंध रखते हैं। इसका रहस्य यहाँ छिपा हुआ है कि क्यों लोग परमेश्वर को नहीं जानते, और इसलिए यह दोष उन सभी में आम कमी है जो परमेश्वर को खोजते हैं। किसी ने भी परमेश्वर को कभी नहीं जाना, न ही उसका सच्चा चेहरा कभी देखा है। यही कारण है कि परमेश्वर का कार्य इतना कठिन बन जाता है जैसे किसी पहाड़ को हटाना या समुद्र को खाली करना। पढना जारी रखे

1. अनुग्रह के युग में परमेश्वर ने मानव जाति को छुटकारा दिलाया था, तो क्यों आखिरी दिनों में उसे न्याय के अपने कार्य को करने की अब भी आवश्यकता है?

अनुग्रह का युग,अंत के दिनों का न्याय

  संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

  ”क्योंकि मैं वह यहोवा हूँ जो तुम्हें मिस्र देश से इसलिये निकाल ले आया हूँ कि तुम्हारा परमेश्‍वर ठहरूँ; इसलिये तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ” (लैव्यव्यवस्था 11:45)।

  ”सबसे मेल मिलाप रखो, और उस पवित्रता के खोजी हो जिसके बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा” (इब्रानियों 12:14)।

  ”यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता; क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ। जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा” (यूहन्ना 12:47-48)। पढना जारी रखे

“देहधारण का रहस्य” पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो

  7. देह में परमेश्वर के आत्मा के कार्य के भी अपने स्वयं के सिद्धान्त हैं। वह परमपिता के कार्य और उत्तरदायित्व को केवल इस आधार पर अपने ऊपर ले सकता था कि वह सामान्य मानवता को धारण किए हुए था। केवल तभी वह अपना काम प्रारम्भ कर सका था। अपने बचपन में, जो कुछ प्राचीन समयों में घटित हुआ था यीशु उन्हें बहुत ज़्यादा नहीं समझ सकता था, और केवल रब्बियों से पूछने के माध्यम से ही वह समझ पाता था। यदि जब उसने पहली बार बोलना सीखा था तब उसने अपने कार्य को आरम्भ किया होता, तो कोई ग़लती न करना कैसे सम्भव हो गया होता? परमेश्वर कैसे ग़लतियाँ कर सकता है? इसलिए, यह केवल उसके समर्थ होने के पश्चात् ही हुआ कि उसने अपना काम आरम्भ किया; उसने तब तक किसी भी कार्य को नहीं किया जब तक वह ऐसे कार्य को आरम्भ करने में पूरी तरह से सक्षम नहीं हो गया। 29 वर्ष की आयु में, यीशु पहले से ही काफी परिपक्व हो चुका था और उसकी मानवता उस कार्य को आरम्भ करने के लिए पर्याप्त थी जो उसे करना था। यह केवल तभी हुआ कि पवित्र आत्मा, जो तीस वर्षों तक अदृष्ट था, उसने स्वयं को प्रकट करना आरम्भ किया, और परमेश्वर का आत्मा आधिकारिक रूप से उसमें कार्य करने लगा। उस समय, यूहन्ना ने उसके लिए मार्ग खोलने के लिए सात वर्षों तक तैयारी की थी, और अपने कार्य का समापन होने पर, यूहन्ना को बंदीगृह में डाल दिया गया था। तब पूरा बोझ यीशु पर आ गया। यदि उसने इस कार्य को 21 या 22 वर्ष की आयु में प्रारम्भ किया होता, जब उसमें मानवता का बहुत अभाव था और उसने बस अभी-अभी युवा वयस्कता में प्रवेश किया था, और उसमें बहुत सी चीज़ों की समझ का अभाव था, तो वह नियन्त्रण रख पाने में असमर्थ होता। उस समय, जब यीशु ने अपनी मध्य आयु में अपने कार्य को आरम्भ किया था उसके कुछ समय पूर्व ही यूहन्ना ने पहले से ही अपने कार्य को सम्पन्न कर लिया था। उस आयु में, उसकी सामान्य मानवता उस कार्य को आरम्भ करने के लिए पर्याप्त थी जो उसे करना चाहिए था। पढना जारी रखे