2. बचाए जाने और पूर्ण उद्धार पाने के बीच सारभूत अंतर क्या है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

मैं तुम से सच सच कहता हूँ कि जो कोई पाप करता है वह पाप का दास है। दास सदा घर में नहीं रहता; पुत्र सदा रहता है” (यूहन्ना 8:34-35)।

जो मुझ से, ‘हे प्रभु! हे प्रभु!’ कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है” (मत्ती 7:21)।

क्योंकि मैं वह यहोवा हूँ जो तुम्हें मिस्र देश से इसलिये निकाल ले आया हूँ कि तुम्हारा परमेश्‍वर ठहरूँ; इसलिये तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ” (लैव्यव्यवस्था 11:45)।

वे सिंहासन के सामने और चारों प्राणियों और प्राचीनों के सामने एक नया गीत गा रहे थे। उन एक लाख चौवालीस हज़ार जनों को छोड़, जो पृथ्वी पर से मोल लिये गए थे, कोई वह गीत न सीख सकता था। पढना जारी रखे

1. बचाया जाना क्या है? पूर्ण उद्धार पाना क्या है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

जो विश्‍वास करे और बपतिस्मा ले उसी का उद्धार होगा, परन्तु जो विश्‍वास न करेगा वह दोषी ठहराया जाएगा” (मरकुस 16:16)।

क्योंकि यह वाचा का मेरा वह लहू है, जो बहुतों के लिये पापों की क्षमा के निमित्त बहाया जाता है” (मत्ती 26:28)।

जो मुझ से, ‘हे प्रभु! हे प्रभु!’ कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है” (मत्ती 7:21)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

उस समय यीशु का कार्य समस्त मानव जाति के छुटकारा का था। उन सभी के पापों को क्षमा कर दिया गया था जो उसमें विश्वास करते थे; जितने समय तक तुम उस पर विश्वास करते थे, उतने समय तक वह तुम्हें छुटकारा देगा; यदि तुम उस पर विश्वास करते थे, तो तुम अब और पापी नहीं थे, तुम अपने पापों से मुक्त हो गए थे। यही है बचाए जाने, और विश्वास द्वारा उचित ठहराए जाने का अर्थ। पढना जारी रखे

3. अनुग्रह के युग की तुलना में राज्य के युग में, कलीसियाई जीवन में क्या अंतर है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

“जब वे खा रहे थे तो यीशु ने रोटी ली, और आशीष माँगकर तोड़ी, और चेलों को देकर कहा, ‘लो, खाओ; यह मेरी देह है।‘ फिर उसने कटोरा लेकर धन्यवाद किया, और उन्हें देकर कहा, ‘तुम सब इसमें से पीओ, क्योंकि यह वाचा का मेरा वह लहू है, जो बहुतों के लिये पापों की क्षमा के निमित्त बहाया जाता है‘” (मत्ती 26:26-28)।

मैं ने स्वर्गदूत के पास जाकर कहा, ‘यह छोटी पुस्तक मुझे दे।’ उसने मुझ से कहा, ‘ले, इसे खा ले; यह तेरा पेट कड़वा तो करेगी, पर तेरे मुँह में मधु सी मीठी लगेगी’” (प्रकाशितवाक्य 10:9)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

जब, अनुग्रह के युग में, परमेश्वर तीसरे स्वर्ग में लौटा, तो समस्त मानव जाति के छुटकारे का परमेश्वर का कार्य वास्तव में पहले से ही अपनी समापन की क्रिया में चला गया था। धरती पर जो कुछ भी शेष रह गया था वह था सलीब जिसे यीशु ने ढोया था, बारीक सन का कपड़ा जिसमें यीशु को लपेटा गया था, और काँटों का मुकुट और लाल रंग का लबादा जो यीशु ने पहना था (ये वे वस्तुएँ थीं जिन्हें यहूदियों ने उसका मज़ाक उड़ाने के लिए उपयोग किया था)। पढना जारी रखे

2. अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के कार्य करने के तरीके और राज्य के युग में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य करने के तरीके के बीच क्या अंतर है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

अपने पहले देहधारण के दौरान, बीमारों को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना परमेश्वर के लिए आवश्यक था क्योंकि उसका कार्य छुटकारा दिलाना था। सम्पूर्ण मानव जाति को छुटकारा दिलाने के लिए, उसे दयालु और क्षमाशील होने की आवश्यकता थी। सलीब पर चढ़ने से पहले उसने जो कार्य किया वह बीमार को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना था, जो उसके द्वारा मनुष्य के पाप और गंदगी से उद्धार के पूर्वलक्षण थे। क्योंकि यह अनुग्रह का युग था, इसलिए बीमारों को चंगा करना, उसके द्वारा संकेतों और चमत्कारों को दिखाना परमेश्वर के लिए आवश्यक था, जो उस युग में अनुग्रह के प्रतिनिधि थे; क्योंकि अनुग्रह का युग अनुग्रह प्रदान करने के आस-पास केन्द्रित था, जिसका प्रतीक शान्ति, आनन्द और भौतिक आशीष थे, जो कि सभी यीशु में लोगों के विश्वास की निशानियाँ थी।

— “वचन देह में प्रकट होता है” में “परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार” से उद्धृत

जो कार्य यीशु ने किया वह उस युग में मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुसार था। उसका कार्य मानवजाति को छुटकारा दिलाना, उन्हें उनके पापों के लिए क्षमा करना था, और इसलिए उसका स्वभाव पूरी तरह से विनम्रता, धैर्य, प्रेम, धर्मपरायणता, सहनशीलता, दया और करुणामय-प्यार से भरा था। पढना जारी रखे

1. अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु द्वारा व्यक्त वचनों और राज्य के युग में सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचनों में क्या अंतर है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है” (मत्ती 4:17)।

“तब उस ने पवित्रशा स्त्र बूझने के लिये उनकी समझ खोल दी, और उनसे कहा, ‘यों लिखा है कि मसीह दु:ख उठाएगा, और तीसरे दिन मरे हुओं में से जी उठेगा, और यरूशलेम से लेकर सब जातियों में मन फिराव का और पापों की क्षमा का प्रचार, उसी के नाम से किया जाएगा‘” (लूका 24:45-47)।

मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा” (यूहन्ना 16:12-13)।

यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता; क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ। जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा” (यूहन्ना 12:47-48)।

पढना जारी रखे

4. परमेश्वर के नाम के महत्व को नहीं जानने और परमेश्वर के नये नाम को स्वीकार न करने की मानवीय समस्या की प्रकृति क्या है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

प्रत्येक समयावधि में, परमेश्वर नया कार्य आरम्भ करेगा, और प्रत्येक अवधि में, मनुष्य के बीच एक नई शुरुआत होगी। यदि मनुष्य केवल सच्चाईयों का ही पालन करता है कि “यहोवा ही परमेश्वर है” और “यीशु ही मसीह है,” जो ऐसी सच्चाईयाँ हैं जो केवल एक अकेले युग पर ही लागू होती हैं, तो मनुष्य कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिला पाएगा, और वह हमेशा पवित्र आत्मा के कार्य को हासिल करने में अक्षम रहेगा। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है, मनुष्य जरा से भी सन्देह के बिना अनुसरण करता है, और वह करीब से अनुसरण करता है। इस तरह, पवित्र आत्मा के द्वारा मनुष्य को कैसे निष्कासित किया जा सकता है? इस बात पर ध्यान दिए बिना कि परमेश्वर क्या करता है, जब तक मनुष्य को निश्चय है कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, और वह बिना किसी आशंका के पवित्र आत्मा के कार्य में सहयोग करता है, और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने का प्रयास करता है, तो उसे कैसे दण्ड दिया जा सकता है? परमेश्वर का कार्य कभी नहीं रूका है, उसके कदम कभी नहीं थमे हैं, और उसके प्रबंधन के कार्य की पूर्णता से पहले, वह सदैव व्यस्त रहा है, और कभी नहीं रुकता है। पढना जारी रखे

3. परमेश्वर का नाम बदल सकता है, लेकिन उसका सार कभी नहीं बदलेगा

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि परमेश्वर अपरिवर्तशील है। यह सही है, किन्तु यह परमेश्वर के स्वभाव और सार की अपरिवर्तनशीलता का संकेत करता है। उसके नाम और कार्य में परिवर्तन से यह साबित नहीं होता है कि उसका सार बदल गया है; दूसरे शब्दों में, परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहेगा, और यह कभी नहीं बदलेगा। यदि तुम कहते हो कि परमेश्वर का कार्य हमेशा अपरिवर्तित रहता है, तो क्या वह अपनी छः-हजार वर्षीय प्रबंधन योजना को पूरा करने में सक्षम होगा? तुम केवल यह जानते हो कि परमेश्वर हमेशा ही अपरिवर्तनीय है, किन्तु क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है? यदि परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तनशील था, तो क्या वह मानवजाति की आज के दिन तक अगुआई कर सकता था? यदि परमेश्वर अपरिवर्तशील है, तो ऐसा क्यों है कि उसने पहले ही दो युगों का कार्य कर लिया है? उसका कार्य आगे बढ़ने से कभी नहीं रुकता है, कहने का अर्थ है कि उसका स्वभाव धीरे-धीरे मनुष्य के सामने प्रकट होता है, और जो कुछ प्रकट होता है वह उसका अंतर्निहित स्वभाव है। पढना जारी रखे

2. परमेश्वर के कार्य के हर चरण का उसके नाम के साथ संबंध

(1) व्यवस्था के युग में परमेश्वर द्वारा यहोवा नाम धारण करने का महत्व

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

“फिर परमेश्‍वर ने मूसा से यह भी कहा, ‘तू इस्राएलियों से यह कहना, तुम्हारे पितरों का परमेश्‍वर, अर्थात् अब्राहम का परमेश्‍वर, इसहाक का परमेश्‍वर, और याक़ूब का परमेश्‍वर, यहोवा, उसी ने मुझ को तुम्हारे पास भेजा है। देख, सदा तक मेरा नाम यही रहेगा, और पीढ़ी पीढ़ी में मेरा स्मरण इसी से हुआ करेगा‘” (निर्गमन 3:15)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

“यहोवा” वह नाम है जिसे मैंने इस्राएल में अपने कार्य के दौरान अपनाया था, और इसका अर्थ है इस्राएलियों (परमेश्वर के चुने हुए लोग) का परमेश्वर जो मनुष्य पर दया कर सकता है, मनुष्य को शाप दे सकता है, और मनुष्य के जीवन को मार्गदर्शन दे सकता है। इसका अर्थ है वह परमेश्वर जिसके पास बड़ी सामर्थ्य है और जो बुद्धि से भरपूर है। …अर्थात्, केवल यहोवा ही इस्राएल के चुने हुए लोगों का परमेश्वर, इब्राहीम का परमेश्वर, इसहाक का परमेश्वर, याकूब का परमेश्वर, मूसा का परमेश्वर, और इस्राएल के सभी लोगों का परमेश्वर है। और इसलिए वर्तमान युग में, यहूदा के कुटुम्ब के अलावा सभी इस्राएली यहोवा की आराधना करते हैं। वे वेदी पर उसके लिए बलिदान करते हैं, और याजकीय लबादे पहनकर मन्दिर में उसकी सेवा करते हैं। वे यहोवा के पुनः प्रकट होने की आशा करते हैं। …यहोवा का नाम इस्राएल के लोगों के लिए एक विशेष नाम है जो व्यवस्था के अधीन जिए थे। पढना जारी रखे

Hindi Christian Movie “बच्चे, घर लौट आओ” क्लिप 4 – परमेश्वर में विश्वास करने के बाद इन्टरनेट गेम खेलने के व्यसन को सफलतापूर्वक छोड़ने के अनुभव एवं गवाही

Hindi Christian Movie “बच्चे, घर लौट आओ” क्लिप 4 – परमेश्वर में विश्वास करने के बाद इन्टरनेट गेम खेलने के व्यसन को सफलतापूर्वक छोड़ने के अनुभव एवं गवाही

कई युवा वेब गेम व्यसनी इंटरनेट को छोड़ना चाहते हैं, परंतु वे स्वयं पर कभी भी नियंत्रण नहीं कर पाते हैं। बार-बार की असफलताओं के बाद, वे हतोत्साहित और निराश हो जाते हैं, और मानते हैं कि इंटरनेट गेम्स को छोड़ना निराशाजनक है। इस मूवी क्लिप में, ईसाइयों का एक समूह, परमेश्वर में विश्वास करने के बाद कैसे उन्होंने इंटरनेट गेम्स को सफलतापूर्वक छोड़ा इस बारे में अपने अनुभवों का ब्यौरा और गवाही देता है …

सर्वाधिक देखा गया: यीशु का वीडियो—परमेश्वर का पृथ्वी पर आना और एक पाप बलि बनना

Hindi Christian Movie “बच्चे, घर लौट आओ” क्लिप 3 – परमेश्वर में सच्ची आस्था गेम खेलने के व्यसन को सफलतापूर्वक तोड़ सकती है

Hindi Christian Movie “बच्चे, घर लौट आओ” क्लिप 3 – परमेश्वर में सच्ची आस्था गेम खेलने के व्यसन को सफलतापूर्वक तोड़ सकती है

ली शिंगुआंग, एक किशोर वेब व्यसनी, अपने इंटरनेट गेम खेलने के व्यसन से पीड़ित था। मानव निर्मित सभी विधियाँ उससे छुड़ाने में नाकामयाब रही और वह एक बंद गली में पँहुच गया, तो वह परमेश्वर में सच्चा विश्वास रखने लगा, उसने परमेश्वर से प्रार्थना की और परमेश्वर पर भरोसा रखा, तथा उसने अपने गेमिंग व्यसन को सफलतापूर्वक छोड़ने का मार्ग पा लिया।

अनुशंसित: परमेश्वर का प्रेम क्या है? गवाही के लेख और वीडियो परमेश्वर के प्रेम को जानें