परमेश्वर के नाम का अर्थ | Hindi Christian Song With Lyrics

परमेश्वर के नाम का अर्थ | Hindi Christian Song With Lyrics

हर युग में, उसके कार्य के हर चरण में,
हर युग में सार्थक रहा है परमेश्वर का नाम,
आधारहीन नहीं है परमेश्वर का नाम।
हर नाम उसका एक युग दर्शाता है।

यहोवा, यीशु और मसीहा सभी परमेश्वर के आत्मा को दर्शाते हैं।
फिर भी, ये नाम परमेश्वर के प्रबंधन में, युगों को दर्शाते हैं,
मगर नहीं दर्शाते उसकी समग्रता को।
नाम जिन्हें धरती पर इंसान कहता है परमेश्वर,
नहीं व्यक्त कर सकते उसके समग्र स्वभाव को,
नहीं व्यक्त कर सकते वो जो है उसको।
वे महज़ नाम हैं परमेश्वर के अलग-अलग युगों में।
इसलिये आएगा जब अंतिम युग, अंत के दिनों का युग,
बदलेगा परमेश्वर का नाम फिर से।
न यहोवा, न यीशु, न मसीहा कहलाएगा वो।
शक्तिशाली और सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहलाएगा वो।
और इसी नाम से करेगा समापन युग का वो।

परमेश्वर कभी कहलाता था यहोवा, कभी कहलाता था मसीहा भी वो।
और कभी प्यार और सम्मान से, लोग कहते थे यीशु उद्धारक उसको।
आज परमेश्वर न यहोवा है, न यीशु है, लोग जानते थे पहले जिसको।
ये वो परमेश्वर है जो लौट आया है अंत के दिनों में,
जो ख़त्म करेगा इस युग को।
अपने पूरे स्वभाव के साथ, अधिकार, सम्मान और महिमा के साथ,
ये परमेश्वर है, स्वयं परमेश्वर है।
ये स्वयं परमेश्वर है, जो उदित होता है धरती के किनारों पर।
ये स्वयं परमेश्वर है, जो उदित होता है धरती के किनारों पर।

परमेश्वर के वचनों से आख़िरकार, दुनिया के देश सभी आशीष पाएँगे
और साथ ही उन वचनों से रौंदे जाएँगे।
देखेंगे इस तरह अंत के दिनों के लोग, उद्धारक परमेश्वर लौट आया है।
ये वो शक्तिशाली सर्वशक्तिमान परमेश्वर है,
जो जीत लेता है हर इंसान को, जीत लेता है हर इंसान को।
वो दिखलाएगा लोगों को, कभी इंसान की पाप-बलि हुआ करता था वो।
मगर अंत के दिनों में, आग है सूरज की वो,
जो भस्म कर देती है हर चीज़ को।
मगर अंत के दिनों में, आग है सूरज की वो,
जो भस्म कर देती है हर चीज़ को।
और धार्मिकता का सूरज है वो, प्रकट करता है हर चीज़ को।
अंत के दिनों में परमेश्वर का यही कार्य है, परमेश्वर का यही कार्य है।

“मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना” से

Hindi Christian Worship Song – New Jerusalem Has Descended – Welcoming the Lord’s Return

V परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण और परमेश्वर के नाम के बीच आपसी संबंध पर उत्कृष्ट वचन

1. प्रत्येक युग में स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य उसके सच्चे स्वभाव की अभिव्यक्ति से युक्त होता है, और उसका नाम और वह जो कार्य करता है दोनों युग के साथ बदल जाते हैं; वे सभी नए होते हैं। व्यवस्था के युग के दौरान, मनुष्यजाति का मार्गदर्शन करने का कार्य यहोवा के नाम के तहत किया गया था, और कार्य का पहला चरण पृथ्वी पर आरंभ किया गया था। इस चरण में, कार्य में मंदिर और वेदी का निर्माण करने, और इस्राएल के लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए व्यवस्था का उपयोग करने और उनके बीच कार्य करने का समावेश था। इस्राएल के लोगों का मार्गदर्शन करके, उसने पृथ्वी पर अपने कार्य के लिए एक आधार स्थापित किया। इस आधार से, उसने अपने कार्य का विस्तार इस्राएल से बाहर किया, जिसका अर्थ है, कि इस्राएल से शुरू करके, उसने अपने कार्य का बाहर विस्तार किया, जिससे बाद की पीढ़ियों को धीरे-धीरे पता चला कि यहोवा परमेश्वर था, और यह कि यह यहोवा ही था जिसने ही स्वर्ग और पृथ्वी का और सभी चीजों का निर्माण किया था, और कि यह यहोवा ही था जिसने सभी प्राणियों को बनाया था। उसने इस्राएल के लोगों के माध्यम से अपने कार्य को उनसे परे फैलाया। इस्राएल की भूमि पृथ्वी पर यहोवा के कार्य का पहला पवित्र स्थान था, और यह इस्राएल का देश ही था जिस पर परमेश्वर पृथ्वी पर सबसे पहले कार्य करने गया। पढना जारी रखे

17. एक झूठा मसीह क्या होता है? एक मसीह-विरोधी को कैसे पहचाना जा सकता है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

जो देहधारी परमेश्वर है, वह परमेश्वर का सार धारण करेगा, और जो देहधारी परमेश्वर है, वह परमेश्वर की अभिव्यक्ति धारण करेगा। चूँकि परमेश्वर देहधारी हुआ, वह उस कार्य को प्रकट करेगा जो उसे अवश्य करना चाहिए, और चूँकि परमेश्वर ने देह धारण किया, तो वह उसे अभिव्यक्त करेगा जो वह है, और मनुष्यों के लिए सत्य को लाने में समर्थ होगा, मनुष्यों को जीवन प्रदान करने, और मनुष्य को मार्ग दिखाने में सक्षम होगा। जिस शरीर में परमेश्वर का सार नहीं है, निश्चित रूप से वह देहधारी परमेश्वर नहीं है; इस बारे में कोई संदेह नहीं है। यह पता लगाने के लिए कि क्या यह देहधारी परमेश्वर है, मनुष्य को इसका निर्धारण उसके द्वारा अभिव्यक्त स्वभाव से और उसके द्वारा बोले वचनों से अवश्य करना चाहिए। कहने का अभिप्राय है कि वह परमेश्वर का देहधारी शरीर है या नहीं, और यह सही मार्ग है या नहीं, इसे परमेश्वर के सार से तय करना चाहिए। और इसलिए, यह निर्धारित करने[क] में कि यह देहधारी परमेश्वर का शरीर है या नहीं, बाहरी रूप-रंग के बजाय, उसके सार (उसका कार्य, उसके वचन, उसका स्वभाव और बहुत सी अन्य बातें) पर ध्यान देना ही कुंजी है। पढना जारी रखे

पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य

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पवित्र आत्मा का कार्य और शैतान का कार्य

तुम आत्मा के सुनिश्चित विवरणों को कैसे समझते हो? पवित्र आत्मा मनुष्य में कैसे कार्य करता है? शैतान मनुष्य में कैसे कार्य करता है? दुष्ट आत्माएँ मनुष्य में कैसे कार्य करती हैं? और इस कार्य के प्रकटीकरण क्या हैं? जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है, तो क्या यह पवित्र आत्मा की ओर से होता है, और क्या तुम्हें उसे मानना चाहिए या ठुकरा देना चाहिए? लोगों की वास्तविक क्रिया उसे बहुत बढ़ा देती है जो मनुष्य की इच्छा से आती है, परंतु फिर भी लोग मानते हैं कि वह पवित्र आत्मा की ओर से है। कुछ बातें दुष्ट आत्माओं की ओर से आती हैं, परंतु फिर भी लोग सोचते हैं कि यह पवित्र आत्मा से जनित है, और कभी-कभी पवित्र आत्मा भीतर से लोगों की अगुवाई करता है, फिर भी लोग डर जाते हैं कि ऐसी अगुवाई शैतान की ओर से होती है, और फिर आज्ञा मानने का साहस नहीं करते, जबकि वास्तविकता में यह पवित्र आत्मा का प्रकाशन होता है। अतः, इनमें भेद किए बिना इसका अनुभव करने का कोई मार्ग नहीं है जब ऐसे अनुभव तुम्हारे साथ घटित होते हैं, तो बिना भेद किए जीवन को प्राप्त करने का भी कोई मार्ग नहीं है। पवित्र आत्मा कैसे कार्य करता है? दुष्ट आत्माएँ कैसे कार्य करती हैं? मनुष्य की इच्छा से क्या निकलता है? पढना जारी रखे

प्रार्थना की क्रिया के विषय में

अपने प्रतिदिन के जीवन में तुम प्रार्थना पर बिलकुल ध्यान नहीं देते। लोगों ने प्रार्थना को सदैव नजरअंदाज किया है। प्रार्थनाएँ लापरवाही से की जाती थीं, जिसमें इंसान परमेश्वर के सामने बस खानापूर्ति करता था। किसी ने भी कभी परमेश्वर के समक्ष पूरी रीति से अपने हृदय को समर्पित नहीं किया है और न ही परमेश्वर से सच्चाई से प्रार्थना की है। लोग परमेश्वर से तभी प्रार्थना करते हैं जब उनके साथ कुछ घटित हो जाता है। इन सारे समयों के दौरान, क्या तुमने कभी सच्चाई के साथ परमेश्वर से प्रार्थना की है? क्या तुमने कभी पीड़ा के आँसुओं को परमेश्वर के सामने बहाया है? क्या तुमने कभी परमेश्वर के सामने स्वयं को पहचाना है? क्या तुमने कभी परमेश्वर के साथ हृदय से हृदय मिलाते हुए प्रार्थना की है? प्रार्थना अभ्यास करने से आती है: यदि तुम सामान्य रीति से घर पर प्रार्थना नहीं करते हो, तब तुम्हारा कलीसिया में प्रार्थना करने का कोई अर्थ नहीं होगा, और यदि तुम छोटी-छोटी सभाओं में सामान्य रीति से प्रार्थना नहीं करते हो, तो बड़ी-बड़ी सभाओं में प्रार्थना करने में भी असमर्थ होगे। यदि तुम सामान्य रीति से परमेश्वर के निकट नहीं आते या परमेश्वर के वचनों पर मनन नहीं करते हो, तो तुम्हारे पास तब कहने के लिए कुछ भी नहीं होगा जब प्रार्थना का समय होगा—और यदि तुम प्रार्थना करते भी हो, तो बस तुम बस दिखावा करोगे, तुम सच्चाई से प्रार्थना नहीं कर रहे होगे। पढना जारी रखे

Hindi Christian Documentary “वह जिसका हर चीज़ पर प्रभुत्व है” क्लिप – रोमन साम्राज्य का उदय और पतन

Hindi Christian Documentary “वह जिसका हर चीज़ पर प्रभुत्व है” क्लिप – रोमन साम्राज्य का उदय और पतन

प्राचीन रोमन साम्राज्य की स्थापना और उदय ईसाई धर्म के प्रसार के लिए हुआ था। ईसाई धर्म को राष्ट्रीय धर्म बनाने के साथ इसका स्वर्ण युग आरंभ हुआ था। और ईसाईयों पर अत्याचार करने के कारण ये तबाह हो गया था। … रोमन साम्राज्य के उदय और पतन के पीछे कारणों को जानने के लिये इस ईसाई फिल्म क्लिप को देखें।

 

Hindi Christian Skit | गौशाला में सभा | Why Do Christians in China Have to Gather Secretly?

Hindi Christian Skit | गौशाला में सभा | Why Do Christians in China Have to Gather Secretly?

ईसाइयों पर नास्तिक सीसीपी सरकार के अत्याचार दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं। विश्वासियों को हर मोड़ पर अपनी आस्था के अभ्यास के लिये पाबंदियों का सामना करना पड़ रहा है; उन्हें ऐसा कोई स्थान नहीं मिल पाता जहाँ वे शांति और सुकून से सभा कर सकें। ऐसी स्थिति में, लियू शियूमिन को भाई-बहनों की सभा अपनी गौशाला में रखनी पड़ती है। लेकिन जब सभा चल रही होती है तो एक के बाद एक, ग्राम कार्यकर्ता आकर ताँक-झाँक करने लगते हैं, तरह-तरह के बहाने बनाते हैं, यहाँ तक कि सीसीपी की पुलिस को भी ले आते हैं… क्या लियू शियूमिन और उनके भाई-बहन सभा कर पाएंगे? क्या वे पकड़े जाएंगे? क्या वे गिरफ्तार होंगे? ‘गौशाला में सभा’ नामक यह लघु-नाटिका इस समस्या पर प्रकाश डालती है कि किस तरह ईसाई धर्म में आस्था रखने वाले लोग चीन में सीसीपी सरकार के अत्याचारों के चलते, अपनी आस्था को बचाए रखने का प्रयास कर रहे हैं।

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Hindi Gospel Movie “मेरे काम में दखल मत दीजिए” क्लिप 2 – प्रभु यीशु के दूसरे आगमन के सुसमाचार को स्वीकार करना और परमेश्वर के सामने स्वर्गारोहित किया जाना

 

 Hindi Gospel Movie “मेरे काम में दखल मत दीजिए” क्लिप 2 – प्रभु यीशु के दूसरे आगमन के सुसमाचार को स्वीकार करना और परमेश्वर के सामने स्वर्गारोहित किया जाना

बाइबल में, पौलुस ने कहा था, “मुझे आश्‍चर्य होता है कि जिसने तुम्हें मसीह के अनुग्रह में बुलाया उससे तुम इतनी जल्दी फिर कर और ही प्रकार के सुसमाचार की ओर झुकने लगे।” (ग़लातियों 1:6) (© BSI)। पादरी और एल्‍डर्स पौलुस के इन वचनों की ग़लत व्‍याख्‍या करते हैं, और उन सभी की, जो प्रभु यीशु के दूसरे आगमन के सुसमाचार को स्‍वीकार करते हैं, यह कहते हुए निंदा करते हैं कि यह स्‍वधर्म त्‍याग होगा और कि यह प्रभु के साथ विश्‍वासघात करना होगा। इसलिए कुछ विश्‍वासी प्रभु का स्‍वागत करने के अवसर को गँवा देते हैं, क्‍योंकि उन्हें धोखा दिया जा चुका है। यह सुस्‍पष्‍ट है कि प्रभु की वापसी का हमारे द्वारा स्वागत किए जाने के लिए इस पाठ के सच्चे अर्थ को स्पष्ट रूप से समझना अत्यधिक महत्‍वपूर्ण है। शास्‍त्र के इस अंश का सही अर्थ क्‍या है? यह वीडियो आपको इस सवाल का जवाब देगा।

यीशु का वीडियो—परमेश्वर का पृथ्वी पर आना और एक पाप बलि बनना

Hindi Christian Video “स्वर्गिक राज्य का मेरा स्वप्न” क्लिप 5 – परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय कार्य और प्रभु यीशु के कार्य में क्या अंतर है?

Hindi Christian Video “स्वर्गिक राज्य का मेरा स्वप्न” क्लिप 5 – परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय कार्य और प्रभु यीशु के कार्य में क्या अंतर है?

कुछ लोग मानते हैं कि प्रभु यीशु के पुनर्जीवित हो कर स्वर्ग में आरोहित होने के बाद, पिन्‍तेकुस्‍त के दिन मनुष्य पर कार्य करने के लिए पवित्र आत्मा नीचे आया। उसने पाप, धार्मिकता और न्याय के संसार की कटु आलोचना की। जब हम पवित्र आत्मा के कार्य को ग्रहण कर अपने पापों के लिए प्रभु के समक्ष पश्चाताप करते हैं, तब हम प्रभु के न्याय का अनुभव करते हैं। पिन्‍तेकुस्‍त के दिन पवित्र आत्मा द्वारा किया गया कार्य परमेश्वर के अंत के दिनों का कार्य होना चाहिए। क्या इसको ग्रहण करने की हमारी विधि सही है? प्रभु यीशु के कार्य और परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय कार्य में क्या अंतर है?

यीशु का वीडियो—परमेश्वर का पृथ्वी पर आना और एक पाप बलि बनना

परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें

आज, मैं मुख्य रूप से इस पर संवाद करूंगा कि लोगों को परमेश्वर पर अपने विश्वास में परमेश्वर की सेवा कैसे करनी चाहिए, किन शर्तों को पूरा किया जाना चाहिए, परमेश्वर की सेवा करने वालों को कौन से सत्य समझने चाहिए, और तुम लोगों की सेवा में कौन-कौन से भटकाव हैं। तुम लोगों को यह सब कुछ समझना चाहिए। ये मुद्दे इस बात की चर्चा करते हैं कि तुम लोग परमेश्वर पर किस प्रकार विश्वास करते हो, तुम लोग पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के मार्ग पर किस प्रकार चलते हो, और कैसे तुम हर चीज़ में परमेश्वर के आयोजनों को समर्पित होते हो, और इससे तुम लोग परमेश्वर के कार्य के हर कदम को जानने में सक्षम होगे। जब तुम लोग उस स्थिति पर पहुँचोगे, तब तुम लोग समझोगे कि परमेश्वर में विश्वास करना क्या होता है, किस प्रकार उचित तरीके से परमेश्वर पर विश्वास करें, और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप कार्य करने के लिए तुम लोगों को क्या करना चाहिए। यह तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य के प्रति पूर्णतः और सर्वथा आज्ञाकारी बना देगा, और तुम लोगों के पास कोई शिकायतें नहीं होंगी, तुम लोग आलोचना या विश्लेषण नहीं करोगे, और अनुसंधान तो बिलकुल नहीं करोगे। इसके अलावा, तुम सभी लोग मृत्यु तक परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी होने में सक्षम होगे, और परमेश्वर को इस काम में सहयोग करोगे कि वह तुम लोगों को एक भेड़ की तरह रास्ते पर ले आए और तुम लोगों का अंत करे, ताकि तुम सभी लोग 1990 के पतरस बन सको, और यहाँ तक कि सलीब पर भी, जरा सी भी शिकायत के बिना, परमेश्वर से अत्यधिक प्रेम कर सको। केवल तभी तुम लोग 1990 के पतरस के समान जीवन बिताने में समर्थ हो सकते हो।

प्रत्येक व्यक्ति जिसने संकल्प लिया है वह परमेश्वर की सेवा कर सकता है—परन्तु यह अवश्य है कि जो परमेश्वर की इच्छा की बहुत परवाह करते हैं और जो परमेश्वर की इच्छा को समझते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा करने के योग्य एवं पात्र हैं। मैंने तुम लोगों में ये पाया है: बहुत से लोगों का मानना है कि जब तक वे परमेश्वर के लिए उत्साहपूर्वक सुसमाचार का प्रचार करते हैं, परमेश्वर के लिए सड़क पर जाते हैं, परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते एवं चीज़ों का त्याग करते हैं, तो यह परमेश्वर की सेवा करना है; यहाँ तक कि अधिक धार्मिक लोग मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ बाइबल को हाथों में लेकर यहाँ-वहाँ भागना, स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को फैलाना और पश्चाताप तथा पाप स्वीकार करवाते हुए लोगों को बचाना है; बहुत से धार्मिक अधिकारी हैं जो सोचते हैं कि सेमेनरी में अध्ययन करने और प्रशिक्षण लेने के बाद प्रार्थनालय में उपदेश देना, बाइबल के अध्यायों को पढ़ कर लोगों को शिक्षा देना परमेश्वर की सेवा करना है; दरिद्र प्रदेशों में ऐसे भी लोग हैं जो मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ चंगाई करना और दुष्टात्माओं को निकालना है, या भाई-बहनों के लिए प्रार्थना करना, या उनकी सेवा करना है; तुम लोगों के बीच, बहुत से ऐसे लोग हैं जो मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना, प्रतिदिन परमेश्वर से प्रार्थना करना, साथ ही हर जगह कलीसियाओं में जाना और कार्य करना है; कुछ ऐसे भाई-बहन भी हैं जो मानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का अर्थ कभी भी विवाह न करना और परिवार न बढ़ाना, और अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को परमेश्वर के प्रति समर्पित कर देना है। फिर भी कुछ लोग जानते हैं कि परमेश्वर की सेवा करने का वास्तविक अर्थ क्या है। यद्यपि परमेश्वर की सेवा करने वाले इतने लोग हैं जितने आकाश में तारे हैं, किन्तु ऐसे लोगों की संख्या नगण्य है—महत्वहीन रूप से कम है, जो प्रत्यक्षतः परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं, और जो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने में समर्थ हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? मैं ऐसा इसलिए कहता हूँ क्योंकि तुम लोग “परमेश्वर की सेवा” के मुख्य सार को नहीं समझते हो, और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा कैसे की जाए, इस बारे में तुम लोग बहुत कम समझते हो। आज, मैं मुख्य रूप से इस बात पर संगति कर रहा हूँ कि परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप किस प्रकार सेवा करें, परमेश्वर की इच्छा को सन्तुष्ट करने के लिए किस प्रकार सेवा करें।

यदि तुम लोग परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करना चाहते हो, तो तुम लोगों को पहले यह समझना होगा कि किस प्रकार के लोग परमेश्वर को प्रिय होते हैं, किस प्रकार के लोगों से परमेश्वर घृणा करता है, किस प्रकार के लोग परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाते हैं, और किस प्रकार के लोग परमेश्वर की सेवा करने के लिए योग्य होते हैं। यह सबसे छोटी चीज़ है जिससे तुम लोगों को सज्जित होना चाहिए। इसके अतिरिक्त, तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य के लक्ष्यों को, और उस कार्य को जानना चाहिए जिसे परमेश्वर अभी यहीँ करेगा। इसे समझने के पश्चात्, और परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन के माध्यम से, तुम लोगों को सबसे पहले प्रवेश करना चाहिए और सबसे पहले परमेश्वर के महान आदेश को प्राप्त करना चाहिए। जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों के आधार पर वास्तव में अनुभव कर लोगे, और जब तुम लोग वास्तव में परमेश्वर के कार्य को जान लोगे, तो तुम लोग परमेश्वर की सेवा करने के लिए योग्य हो जाओगे। जब तुम लोग उसकी सेवा करते हो, तब परमेश्वर तुम लोगों की आध्यात्मिक आँखों को खोलता है, और तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य की अधिक समझ प्राप्त करने एवं उसे अधिक स्पष्टता से देखने की अनुमति देता है। जब तुम इस वास्तविकता में प्रवेश करते हो, तो तुम्हारे अनुभव अधिक गम्भीर एवं वास्तविक हो जाएँगे, और तुम लोगों में से वे सभी, जिन्हें इस प्रकार के अनुभव हुए हैं, कलीसियाओं के बीच आने-जाने और तुम लोगों के भाई-बहनों को, तुम लोगों की स्वयं की कमियों को पूरा करने के लिए दूसरे की मज़बूतियों का इस्तेमाल कर सको, और अपनी आत्माओं में एक अधिक समृद्ध ज्ञान प्राप्त करो। केवल इस प्रभाव को प्राप्त करने के बाद ही तुम लोग परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने और अपनी सेवा के दौरान परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के योग्य बनोगे।

जो परमेश्वर की सेवा करते हैं वे परमेश्वर के अंतरंग होने चाहिए, वे परमेश्वर को प्रिय होने चाहिए, और उन्हें परमेश्वर के प्रति अत्यंत वफादारी के लिए सक्षम होना चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम लोगों के पीठ पीछे कार्यकलाप करते हो या उनके सामने, तुम परमेश्वर के सामने परमेश्वर के आनन्द को प्राप्त करने में समर्थ हो, तुम परमेश्वर के सामने अडिग रहने में समर्थ हो, और इस बात की परवाह किए बिना कि अन्य लोग तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार करते हैं, तुम हमेशा अपने स्वयं के मार्ग पर चलते हो, और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी का पूरा ध्यान रखते हो। केवल यही परमेश्वर का अंतरंग होना है। यह कि परमेश्वर के अंतरंग ही सीधे तौर पर उसकी सेवा करने में समर्थ हैं, क्योंकि उन्हें परमेश्वर का महान आदेश और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी दी गई है, वे परमेश्वर के हृदय को अपने स्वयं के हृदय के रूप में मानने और परमेश्वर की ज़िम्मेदारी को अपनी जिम्मेदारी मानने में समर्थ हैं, और वे इस बात पर कोई विचार नहीं करते हैं कि उन्हें संभावना प्राप्त होगी या खो जाएगी: यहाँ तक कि जब उनके पास संभावना नहीं होती है, और वे कुछ भी प्राप्त नहीं करेंगे, तब भी वे एक प्रेममय हृदय के साथ हमेशा परमेश्वर में विश्वास करेंगे। इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर का अंतरंग है। परमेश्वर के अंतरंग उसके विश्वासपात्र भी हैं; केवल परमेश्वर के विश्वासपात्र ही उसकी बेचैनी, और उसकी चाहतों को साझा कर सकते हैं। यद्यपि उनकी देह दुःखदायी और कमज़ोर हैं, फिर भी वे परमेश्वर को सन्तुष्ट करने के लिए दर्द को सहन कर सकते हैं एवं उसे छोड़ सकते हैं जिससे वे प्रेम करते हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों को और भी अधिक ज़िम्मेदारी देता है, और जो परमेश्वर करेगा, वह इन लोगों के माध्यम से प्रकट होता है। इस प्रकार, ये लोग परमेश्वर को प्रिय हैं, वे परमेश्वर के सेवक हैं जो उसके हृदय के अनुरूप हैं, और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के साथ-साथ शासन कर सकते हैं। जब तुम वास्तव में परमेश्वर के अंतरंग बन जाते हो, तो निश्चित रूप से तुम परमेश्वर के साथ-साथ शासन करोगे।

यीशु परमेश्वर के आदेश—समस्त मानवजाति के छुटकारे के कार्य—को पूरा करने में समर्थ था क्योंकि उसने अपनी व्यक्तिगत योजनाओं एवं विचारों के बिना परमेश्वर की इच्छा की पूरी परवाह की। इसलिए भी, वह परमेश्वर—परमेश्वर स्वयं का अंतरंग था, कुछ ऐसा जिसे तुम सभी लोग अच्छी तरह से समझते हो। (वास्तव में, वह परमेश्वर स्वयं था, जिसकी गवाही परमेश्वर के द्वारा दी गई थी; इस विषय की व्याख्या करने हेतु यीशु के तथ्य का उपयोग करने के लिए मैंने इसका यहाँ उल्लेख किया है।) वह परमेश्वर की प्रबन्धन योजना को बिलकुल केन्द्र में स्थापित करने में समर्थ था, और स्वर्गिक पिता से हमेशा प्रार्थना करता था और स्वर्गिक पिता की इच्छा की तलाश करता था। उसने प्रार्थना की और कहाः “परमपिता परमेश्वर! जो तेरी इच्छा हो उसे पूरी कर, और मेरी इच्छाओं के अनुसार कार्य मत कर; तू जैसा चाहे वैसे अपनी योजना के अनुसार काम कर। मनुष्य कमज़ोर हो सकता है, किन्तु तुझे उसकी चिंता क्यों करनी चाहिए? मनुष्य तेरी चिंता के योग्य कैसे हो सकता है, मनुष्य जो कि तेरे हाथों में एक चींटी के समान है? मैं अपने हृदय में केवल तेरी इच्छा को पूरा करना चाहता हूँ, और चाहता हूँ कि तू वह कर सके जो तू अपनी इच्छाओं के अनुसार मुझ में करना चाहता है।” यरूशलेम जाने के मार्ग पर, यीशु ने संताप में महसूस किया, मानो कि कोई एक नश्तर उसके हृदय में भोंक दिया गया हो, फिर भी उसमें अपने वचन से पीछे हटने की थोड़ी सी भी इच्छा नहीं थी; हमेशा से एक सामर्थ्यवान ताक़त थी जो उसे लगातार उस ओर आगे बढ़ने के लिए बाध्य कर रही थी जहाँ उसे सलीब पर चढ़ाया जाएगा। अंततः, उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया और वह मानवजाति के छुटकारे के कार्य को पूरा करते हुए, तथा मृत्यु एवं अधोलोक के बन्धनों से ऊपर उठते हुए, पापमय देह के सदृश बन गया। उसके सामने नैतिकता, नरक एवं अधोलोक ने अपनी सामर्थ्य खो दी, और उसके द्वारा परास्त हो गए थे। वह तैंतीस वर्षों तक जीवित रहा, पूरे समयकाल में उसने उस वक्त परमेश्वर के कार्य के अनुसार परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए, अपने व्यक्तिगत लाभ या नुकसान के बारे में कभी विचार नहीं करते हुए, और हमेशा परमपिता परमेश्वर की इच्छा के बारे में सोचते हुए, हमेशा अपना अधिकतम प्रयास किया। उसका बपतिस्मा हो जाने के बाद, परमेश्वर ने कहाः “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।” परमेश्वर के सामने उसकी सेवा के कारण, जो परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप था, परमेश्वर ने उसके कंधों पर समस्त मानवजाति के छुटकारे की भारी ज़िम्मेदारी डाल दी और उसे पूरा करने के लिए उसे आगे बढ़ा दिया, और वह इस महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने के लिए योग्य एवं पात्र बन गया। अपने पूरे जीवनकाल में, उसने परमेश्वर के लिए अपरिमित कष्ट सहा, उसे शैतान के द्वारा अनगिनित बार प्रलोभित किया गया, किन्तु वह कभी भी निरुत्साहित नहीं हुआ। परमेश्वर ने उसे ऐसा कार्य इसलिए दिया था क्योंकि वह उस पर भरोसा करता था और उससे प्रेम करता था, और इसलिए परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से कहाः “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।” उस समय, केवल यीशु ही इस आदेश को पूरा कर सकता था, और यह अनुग्रह के युग में परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किए गए समस्त लोगों के छुटकारे के उसके कार्य का एक भाग था।

यदि, यीशु के समान, तुम लोग परमेश्वर की ज़िम्मेदारी पर पूरा ध्यान देने में समर्थ हो, और अपनी देह की इच्छाओं से मुँह मोड़ सकते हो, तो परमेश्वर अपना महत्वपूर्ण कार्य तुम लोगों को सौंप देगा, ताकि तुम लोग परमेश्वर की सेवा करने की शर्तों को पूरा कर सको। केवल ऐसी परिस्थितियों में ही तुम लोगों में यह कहने की हिम्मत होगी कि तुम लोग परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर रहे हो एवं उसके आदेश को पूरा कर रहे हो, केवल तभी तुम लोग यह कहने की हिम्मत करोगे कि तुम लोग सचमुच में परमेश्वर की सेवा कर रहे हो। यीशु के उदाहरण की तुलना में, क्या तुममें यह कहने की हिम्मत है कि तुम परमेश्वर के अंतरंग हो? क्या तुममें यह कहने की हिम्मत है कि तुम परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर रहे हो? क्या तुममें यह कहने की हिम्मत है कि तुम सचमुच परमेश्वर की सेवा कर रहे हो? आज, तुम परमेश्वर के प्रति ऐसी सेवा को नहीं समझते हो, तो क्या तुममें यह कहने की हिम्मत है कि तुम परमेश्वर के अंतरंग हो? यदि तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा करते हो, तो क्या तुम उसका तिरस्कार नहीं करते हो? इसके बारे में विचार करो: क्या तुम परमेश्वर की सेवा कर रहे हो या स्वयं की सेवा कर रहे हो? तुम शैतान की सेवा करते हो, फिर भी तुम ढिठाई से कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा कर रहे हो—इसमें क्या तुम परमेश्वर का तिरस्कार नहीं कर रहे हो? मेरी पीठ पीछे बहुत से लोग हैसियत के आशीष का लोभ करते हैं, वे ठूँस-ठूँस कर खाना खाते हैं, वे नींद से प्यार करते हैं तथा देह की इच्छाओं पर बहुत ध्यान देते हैं, हमेशा भयभीत रहते हैं कि देह से बाहर कोई मार्ग नहीं है। वे कलीसिया में अपना सामान्य कार्य नहीं करते हैं, और मुफ़्त में कलीसिया से खाते हैं, या अन्यथा मेरे वचनों से अपने भाई-बहनों की भर्त्सना करते हैं, वे ऊँचे स्थान में खड़े होते हैं तथा दूसरों के ऊपर आधिपत्य जताते हैं। ये लोग निरन्तर कहते रहते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर रहे हैं, वे हमेशा कहते हैं कि वे परमेश्वर के अंतरंग हैं—क्या यह बेतुका नहीं है? यदि तुम्हारे पास सही प्रेरणाएँ हैं, किन्तु तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने में असमर्थ हो, तो तुम मूर्ख हो; किन्तु यदि तुम्हारी प्रेरणाएँ सही नहीं हैं, और तुम तब भी कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा करते हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर का विरोध करता है, और तुम्हें परमेश्वर के द्वारा दण्डित किया जाना चाहिए! ऐसे लोगों के लिए मेरे पास कोई सहानुभूति नहीं है! परमेश्वर के घर में वे मुफ़्तखोरी करते हैं, और हमेशा देह के आराम का लोभ करते हैं, और परमेश्वर की इच्छाओं पर कोई विचार नहीं करते हैं; वे हमेशा उसकी खोज करते हैं जो उनके लिए अच्छा है, वे परमेश्वर की इच्छा पर कोई ध्यान नहीं देते हैं, वे जो कुछ भी करते हैं उस पर परमेश्वर की आत्मा के द्वारा कोई विचार नहीं किया जाता है, वे हमेशा अपने भाई-बहनों के विरुद्ध चालाकी करते और धोखा देते रहते हैं, और दो-मुँहे होकर, वे दाख की बाड़ी में लोमड़ी के समान, हमेशा अंगूरों को चुराते हैं और दाख की बाड़ी को कुचलते हैं। क्या ऐसे लोग परमेश्वर के अंतरंग हो सकते हैं? क्या तुम परमेश्वर की आशीषों को प्राप्त करने के लायक़ हो? तुम अपने जीवन एवं कलीसिया के लिए कोई उत्तरदायित्व नहीं लेते हो, क्या तुम परमेश्वर के आदेश को लेने के लायक़ हो? कौन तुम जैसे व्यक्ति पर भरोसा करने की हिम्मत करेगा? जब तुम इस प्रकार से सेवा करते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें बड़ा काम देने की हिम्मत कर सकता है? क्या तुम चीजों में विलंब नहीं कर रहे हो?

मैं ऐसा कहता हूँ ताकि तुम लोग जान लो कि परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप में सेवा करने के लिए कौन सी शर्तों को पूरा अवश्य करना चाहिए। यदि तुम लोग अपना हृदय परमेश्वर को नहीं देते हो, यदि तुम लोग यीशु की तरह परमेश्वर की इच्छा की पूरी परवाह नहीं करते हो, तो तुम लोगों पर परमेश्वर के द्वारा भरोसा नहीं किया जा सकता है, और अंतत: परमेश्वर द्वारा तुम्हारा न्याय किया जायेगा। शायद आज, परमेश्वर के प्रति तुम्हारी सेवा में, तुम हमेशा से परमेश्वर को धोखा देने के इरादे को आश्रय देते हो—किन्तु परमेश्वर तब भी तुम्हें ध्यान में रखेगा। संक्षेप में, इन सभी बातों की परवाह किए बिना, यदि तुम परमेश्वर को धोखा देते हो तो तुम्हारे ऊपर न्याय का निर्मम डंडा पड़ेगा। तुम लोगों को परमेश्वर की सेवा के सही मार्ग पर अभी-अभी प्रवेश करने का लाभ सबसे पहले परमेश्वर को अपने हृदय, अखंड वफादारी के बिना, देने के लिए उठाना चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम परमेश्वर के सामने हो, या लोगों के सामने हो, तुम्हारे हृदय को हमेशा परमेश्वर के सम्मुख होना चाहिए, और तुम्हारा यीशु के समान परमेश्वर से प्रेम करने का संकल्प होना चाहिए। इस तरीके से, परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाएगा, ताकि तुम परमेश्वर के ऐसे सेवक बन जाओ जो उसके हृदय के अनुकूल हो। यदि तुम परमेश्वर के द्वारा वास्तव में पूर्ण बनाए जाना, और अपनी सेवा को उसकी इच्छा के अनुरूप बनाना चाहते हो, तो परमेश्वर के प्रति विश्वास के बारे में तुम्हें अपने पूर्व दृष्टिकोण को बदलना चाहिए, और जिस तरीके से तुम परमेश्वर की सेवा किया करते थे उसे बदलना चाहिए, ताकि परमेश्वर द्वारा तुम्हें अधिक से अधिक पूर्ण बनाया जाए; इस तरीके से, परमेश्वर तुम्हें नहीं त्यागेगा, और पतरस के समान, तुम उन लोगों की पंक्ति में सबसे आगे होगे जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं। यदि तुम पश्चाताप नहीं करते हो, तो तुम्हारा अंत यहूदा के समान होगा। इसे उन सभी लोगों को समझ लेना चाहिए जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं।

स्रोत: चमकती पूर्वी बिजली