सात बार के सत्तर गुने तक क्षमा करो और प्रभु का प्रेम

4. सात बार के सत्तर गुने तक क्षमा करो

मत्ती 18:21-22 तब पतरस ने पास आकर उस से कहा, “हे प्रभु, यदि मेरा भाई अपराध करता रहे, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ? क्या सात बार तक?” यीशु ने उससे कहा, “मैं तुझ से यह नहीं कहता कि सात बार तक वरन् सात बार के सत्तर गुने तक।”

5. प्रभु का प्रेम

मत्ती 22:37-39 उसने उससे कहा, “तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।”

इन दोनों अंशों में, एक क्षमा के बारे में बात करता है और दूसरा प्रेम के बारे में बात करता है। ये दोनों विषय वास्तव में प्रभु यीशु के कार्यों की विशिष्टता से दर्शाते हैं जिन्हें यीशु अनुग्रह के युग में कार्यान्वित करना चाहता था।

जब परमेश्वर देह बन गया, तो वह उसके साथ अपने कार्य का एक चरण ले कर आया—वह उसके साथ विशिष्ट कार्य और उस स्वभाव को लेकर आया जिसे वह इस युग में व्यक्त करना चाहता था। उस अवधि में, वह सब कुछ जो मनुष्य के पुत्र ने किया वह उस कार्य के चारों ओर घूमता था जिसे परमेश्वर इस युग में करना चाहता था। वह न इससे कुछ ज़्यादा करेगा न कम। हर एक बात जो उसने कही और हर एक प्रकार का कार्य जो उसने किया वह सब इस युग से सम्बंधित था। इस बात की परवाह किए बिना कि उसने इसे मानवीय तरीके से मानवीय भाषा में व्यक्त किया या दिव्य भाषा के माध्यम से—भले ही कोई सा भी तरीका, या किसी भी परिप्रेक्ष्य से क्यों न रहा हो—उसका उद्देश्य था कि जो वह करना चाहता था, जो उसकी इच्छा थी, और लोगों से जो उसकी अपेक्षाएँ थीं उन्हें समझने में लोगों की सहायता करे। वह परमेश्वर की इच्छा को समझने और जानने में, मनुष्यजाति को बचाने के उसके कार्य को समझने में लोगों की सहायता करने के लिए विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से विभिन्न उपायों का उपयोग कर सकता था। इसलिए अनुग्रह के युग में हम देखते हैं कि प्रभु यीशु जो कुछ मनुष्यजाति को बताना चाहता था उसे व्यक्त करने के लिए अधिकांश समय मानवीय भाषा का उपयोग करता है। उससे भी बढ़कर, हम उसे एक साधारण मार्गदर्शक के परिप्रेक्ष्य से देखते हैं जो लोगों के साथ बात कर रहा होता है, उनकी आवश्यकताओं की आपूर्ति कर रहा होता है, और जिसके लिए उन्होंने विनती की है उसमें उनकी सहायता कर रहा होता है। कार्य करने का यह तरीका व्यवस्था के युग में देखने में नहीं आता था जो अनुग्रह के युग के पहले आया था। वह मनुष्यजाति के साथ और ज़्यादा अंतरंग तथा उनके प्रति और अधिक करुणामय, और साथ ही रूप और तरीके दोनों में व्यावहारिक परिणामों को प्राप्त करने में और अधिक समर्थ हो गया था। सात बार के सत्तर गुने तक लोगों को क्षमा करने के बारे में उपमा वास्तव में इस बिन्दु को स्पष्ट करती है। इस उपमा में संख्या द्वारा प्राप्त उद्देश्य लोगों को यह समझने देना है कि प्रभु यीशु ने जब ऐसा कहा तब उसके क्‍या इरादे थे, । उसका इरादा था कि लोगों को दूसरों को क्षमा कर देना चाहिए—एक या दो बार नहीं, यहाँ तक कि सात बार भी नहीं, बल्कि सात बार के सत्तर गुने तक। “सात बार के सत्तर गुने तक” यह किस प्रकार का मत है? यह लोगों से क्षमा को उनका स्वयं का उत्तरदायित्व बनवाने के लिए है, ऐसा कुछ है जिसे उन्हें अवश्य सीखना चाहिए, और एक ऐसा मार्ग है जिस पर उन्हें अवश्य चलना चाहिए। भले ही यह मात्र एक उपमा थी, किन्तु इसने एक निर्णायक बिन्दु की भूमिका निभायी थी। इसने उस बात की गहराई से सराहना करने में जो परमेश्वर कहना चाहता था और अभ्यास के उचित तरीकों और अभ्यास में सिद्धांतों और मानकों की खोज करने में लोगों की सहायता की। इस उपमा ने स्पष्ट रूप से समझने में लोगों की सहायता की और उन्हें परिशुद्ध धारणा दी—कि उन्हें क्षमा सीखनी चाहिए—और बिना किसी शर्त के कितनी भी बार क्षमा करना चाहिए, लेकिन दूसरों के प्रति सहिष्‍णुता का रवैया और समझ के साथ। जब प्रभु यीशु ने ऐसा कहा, तब उसके हृदय में क्या था? क्या वह वास्तव में सात बार के सत्तर गुने तक के बारे में सोच रहा था? वह नहीं सोच रहा था। क्या उन समयों की कोई संख्या है कि कितनी बार परमेश्वर मनुष्य को क्षमा करेगा। ऐसे बहुत से लोग हैं जो उल्लेख किए गए “समयों की संख्या” में रूचि रखते हैं, जो वास्तव में इस संख्या के उद्गम और अर्थ के बारे में समझना चाहते हैं। वे समझना चाहते हैं कि यह संख्या प्रभु यीशु के मुँह से क्यों निकली थी; वे मानते हैं कि इस संख्या का कोई अधिक गहरा निहितार्थ है। वास्तव में, यह सिर्फ मानवता में परमेश्वर की अभिव्यक्ति थी। किसी भी अभिप्राय या अर्थ को मनुष्यजाति के प्रति प्रभु यीशु की आकांक्षाओं के साथ-साथ अवश्य लिया जाना चाहिए। जब परमेश्वर देह नहीं बना था, तब जो कुछ वह कहता था लोग उसे काफी हद तक नहीं समझते थे क्योंकि वह पूर्ण दिव्यता से आया था। जो वह कहता था उसका परिप्रेक्ष्य और संदर्भ मनुष्यजाति के लिए अदृश्य और अगम्य था; वह आध्यात्मिक क्षेत्र से प्रकट होता था जिसे लोग देख नहीं सकते थे। जो लोग देह में जीवन बिताते थे, वे आध्यात्मिक क्षेत्र से होकर नहीं गुज़र सकते थे। परन्तु परमेश्वर के देह बनने के बाद, उसने मानवीय परिप्रेक्ष्य से मनुष्‍य जाति से बात की, और वह आध्यात्मिक क्षेत्र के दायरे से बाहर आया और उससे आगे बढ़ गया। मनुष्यजाति को उस अंश तक जिस तक वे समर्थ हैं परमेश्वर को समझने और जानने देने, और उनकी क्षमता के दायरे के भीतर उसके इरादे और उसके अपेक्षित मानकों को बूझने देने के लिए, उन चीज़ों के द्वारा जिनकी कल्पना मनुष्य कर सकते थे और उन चीज़ों के द्वारा जिन्हें उन्होंने अपने जीवन में देखा और सामना किया था, और ऐसी पद्धतियों के उपयोग के द्वारा जिन्हें मनुष्य स्वीकार कर सकते थे, एक ऐसी भाषा में जिसे वे समझ सकते थे, और ऐसे ज्ञान के द्वारा जिसे वे समझ सकते थे, वह अपने दिव्य स्वभाव, इच्छा, और रवैये को व्यक्त कर सकता था। यह मानवता मे परमेश्वर के कार्य की पद्धति और सिद्धांत थे। यद्यपि देह में होकर कार्य करने से परमेश्वर के तरीकों और सिद्धांतों को मुख्यतः उसकी मानवता के द्वारा या माध्यम से प्राप्त किया गया था, फिर भी इसने सचमुच में ऐसे परिणामों को प्राप्त किया जिन्हें सीधे दिव्यता में होकर कार्य करने से प्राप्त नहीं किया जा सकता था। मानवता में परमेश्वर का कार्य ज़्यादा ठोस, प्रामाणिक, और लक्षित था, और पद्धतियाँ कहीं ज़्यादा लचीली थीं, तथा आकार में यह व्यवस्था के युग से बढ़कर था।

नीचे, आओ हम प्रभु से प्रेम करने और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करने के बारे में बात करें। क्या यह कुछ ऐसा है जो सीधे तौर पर दिव्यता में प्रकट होता है? स्पष्ट रूप से नहीं! ये सब वे चीज़े थीं जिन्हें मनुष्य के पुत्र ने मानवता में कहा था; केवल लोग ही कुछ ऐसा कहेंगे “अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर। दूसरों से प्रेम करना अपने स्वयं के जीवन को दुलारने के समान है,” और केवल लोग ही इस तरह से बात करेंगे। परमेश्वर ने कभी भी इस तरह बात नहीं की है। कम से कम, परमेश्वर के पास अपनी दिव्यता में इस प्रकार की भाषा नहीं होती है क्योंकि उसे मनुष्यजाति के प्रति अपने प्रेम को नियंत्रित करने के लिए इस प्रकार के सिद्धांत की आवश्यकता नहीं होती है कि “अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर,” क्योंकि मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम उसके स्वभाव का प्राकृतिक प्रकाशन है। क्या तुम लोगों ने कभी सुना है कि परमेश्वर ने ऐसा कुछ कहा कि “मैं मनुष्य से ऐसा प्रेम करता हूँ जैसा मैं अपने आप से प्रेम करता हूँ”? क्योंकि प्रेम परमेश्वर के सार में, और उसके स्वरूप में है। मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम और वह जिस तरह से लोगों के साथ व्यवहार करता है और उसका रवैया उसके स्वभाव की प्राकृतिक अभिव्यक्ति और प्रकाशन है। उसे जानबूझकर किसी निश्चित तरीके से ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है, या अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करना प्राप्त करने के लिए जानबूझकर किसी निश्चित तरीके या एक नैतिक संहिता का अनुसरण करने की कोई आवश्यकता नहीं है—उसके पास पहले से ही इस प्रकार का सार है। तुम इसमें क्या देखते हैं? जब परमेश्वर ने मानवता में होकर काम किया, तो उसकी बहुत सी पद्धतियाँ, उसके बहुत से वचन, और उसके बहुत से सत्य सब कुछ मानवीय तरीके से व्यक्त हुए थे। परन्तु साथ ही परमेश्वर का स्वभाव, और परमेश्वर का स्वरूप, और उसकी इच्छा, लोगों के जानने और समझने के लिए व्यक्त हुए थे। जो कुछ उन्होंने जाना और समझा था वह वास्तव में उसका सार और उसका स्वरूप था, जो स्वयं परमेश्वर की अंतर्निहित पहचान और हैसियत को दर्शाते थे। अर्थात्, देह में मनुष्य के पुत्र ने स्वयं परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव और सार को अधिकतम संभव सीमा तक और यथासंभव परिशुद्ध तरीके से व्यक्त किया था। न केवल मनुष्य के पुत्र की मानवता स्वर्गिक परमेश्वर के साथ मनुष्य के संवाद और अंतः-क्रिया में कोई व्यवधान या कोई बाधा नहीं थी, बल्कि वह मनुष्यजाति के लिए सृष्टि के प्रभु से जुड़ने का एकमात्र माध्यम और एकमात्र सेतु थी। इस बिन्दु पर, क्या तुम लोग यह महसूस नहीं करते हो कि अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति और पद्धतियों और कार्य के वर्तमान चरण के बीच बहुत सी समानताएँ हैं? कार्य का यह वर्तमान चरण परमेश्वर के स्वभाव को व्यक्त करने के लिए ढेर सारी मानवीय भाषाओं का भी उपयोग करता है, और यह परमेश्वर की स्वयं की इच्छा को व्यक्त करने के लिए मनुष्यजाति के दैनिक जीवन और मानवीय ज्ञान में से ढेर सारी भाषाओं और पद्धतियों का प्रयोग करता है। एक बार जब परमेश्वर देह बन जाता है, तो फिर चाहे वह मानवीय परिप्रेक्ष्य या दिव्य परिप्रेक्ष्य से ही क्यों न बात करे, प्रकटीकरण की उसकी ढेर सारी भाषा और पद्धतियाँ सभी मानवीय भाषा और पद्धतियों के माध्यम से होती हैं। अर्थात्, जब परमेश्वर देह बन गया, तो यह तुम्हारे लिए उसकी सर्वशक्तिमत्ता और उसकी बुद्धि को देखने और परमेश्वर के प्रत्येक सच्चे पहलू को जानने का बेहतरीन अवसर था। जब परमेश्वर देह बन गया, उसके बड़े होने के दौरान, उसने मनुष्यजाति के ज्ञान, व्यावहारिक ज्ञान, भाषा, और मानवता में अभिव्यक्ति की पद्धतियों को समझा, सीखा, और ग्रहण किया। देहधारी परमेश्वर इन चीज़ों को धारण करता था जो उन मनुष्यों से आयी थीं जिन्हें उसने सृजित किया था। वे उसके स्वभाव और उसकी दिव्यता को व्यक्त करने के लिए देहधारी परमेश्वर के साधन बन गए, और जब वह मानवीय परिप्रेक्ष्य से और मानवीय भाषा का उपयोग करते हुए मनुष्यजाति के बीच कार्य कर रहा था, तब उन्होंने उसे उसके कार्य को अधिक उचित, अधिक प्रामाणिक, और अधिक सटीक बनाने दिया। इसने लोगों के लिए इसे और अधिक सुगम और आसानी से समझने योग्य बनाया, इस प्रकार ऐसे परिणामों को प्राप्त किया जिन्हें परमेश्वर चाहता था। क्या इस तरह देह में कार्य करना परमेश्वर के लिए अधिक व्यावहारिक नहीं है? क्या यह परमेश्वर की बुद्धि नहीं है? जब परमेश्वर देहधारी हुआ, और जब परमेश्वर का देह उस कार्य को सँभालने में समर्थ हुआ जिसे वह करना चाहता था, ऐसा तब है कि वह व्यावहारिक रूप से अपने स्वभाव और अपने कार्य को व्यक्त करता, और यही वह समय भी था जब वह मनुष्य के पुत्र के रूप में आधिकारिक रूप से अपनी सेवकाई की शुरूआत कर सकता था। इसका मतलब था कि परमेश्वर और मनुष्यों के बीच अब और कोई “पीढ़ी का अंतराल” नहीं था, और यह कि परमेश्वर जल्द ही सन्देशवाहकों के माध्यम से संवाद करने के अपने कार्य को रोक देगा, और स्वयं परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से सभी वचनों को प्रकट करेगा और देह में होकर काम करेगा जिसे वह करना चाहता था। इसका अर्थ यह भी था कि जिन लोगों को परमेश्वर बचाता है वे उसके अधिक करीब थे, और यह कि उसके प्रबन्धन के कार्य ने एक नए क्षेत्र में प्रवेश कर लिया था, और यह कि संपूर्ण मनुष्यजाति का सामना एक नए युग से होने ही वाला था।

जिसने बाइबल पढ़ा है वह हर कोई जानता है कि जब यीशु का जन्म हुआ था तो बहुत सी चीज़े घटित हुई थीं। उनमें से सबसे बड़ी थी शैतानों के राजा के द्वारा शिकार किया जाना, यहाँ तक कि उस स्थिति तक कि उस क्षेत्र के दो वर्ष या उस से नीचे के सभी बच्चों का भी वध किया जा रहा था। यह स्पष्ट है कि मनुष्यों के बीच देह होकर परमेश्वर ने बड़ा जोखिम अपनाया था; और मनुष्यजाति को बचाने के अपने प्रबन्धन को पूरा करने के लिए उसने जो बड़ी कीमत चुकाई वह भी स्पष्ट है। वे बड़ी आशाएँ जो परमेश्वर को अपने कार्य के ऊपर थी जिसे उसने देह में होकर मनुष्यजाति के बीच किया था वे भी स्पष्ट हैं। जब परमेश्वर का देह मनुष्यजाति के बीच अपने कार्य को सँभालने में समर्थ था, तो वह कैसा महसूस कर रहा था? लोगों को उसे थोड़ा बहुत समझना चाहिए, ठीक है न? कम से कम परमेश्वर प्रसन्न था क्योंकि वह मनुष्यजाति के बीच अपने नए कार्य का विकास करना आरम्भ कर सकता था। जब प्रभु यीशु का बपतिस्मा हुआ था और उसने आधिकारिक रूप से अपनी सेवकाई को पूरा करने के अपने कार्य को आरम्भ किया था, तो परमेश्वर का हृदय आनन्द से अभिभूत हो गया था क्योंकि इतने वर्षों की प्रतीक्षा और तैयारी के बाद, वह अंततः एक औसत इन्सान की देह को पहन सका था और लहू और माँस के एक मनुष्य के रूप में अपने नए कार्य को आरम्भ कर सका था जिसे लोग देख और छू सकते थे। वह अंततः मनुष्य की पहचान के माध्यम से लोगों के साथ आमने-सामने और खुलकर बात कर सकता था। परमेश्वर मानवीय भाषा में, मानवीय तरीके से, मनुष्यजाति के साथ रूबरू हो सकता था; वह मनुष्यजाति का भरण-पोषण कर सकता था, उन्हें प्रबुद्ध कर सकता था, और मानवीय भाषा का उपयोग कर उनकी सहायता कर सकता था; वह उनके साथ एक ही मेज़ पर बैठ कर भोजन कर सकता था और उसी जगह पर उनके साथ रह सकता था। वह मनुष्यों को भी देख सकता था, चीज़ों को देख सकता था, और चीज़ को उसी तरह से देख सकता था जैसे मनुष्य देखते हैं और वो भी स्वयं अपनी आँखों से। परमेश्वर के लिए, यह पहले से ही देह में उसके कार्य की उसकी पहली विजय थी। ऐसा भी कहा जा सकता है कि यह एक महान कार्य की पूर्णता थी—यह निस्संदेह वह था जिसके बारे में परमेश्वर सबसे अधिक प्रसन्न था। तब से शुरू हो कर यह पहली बार था कि परमेश्वर ने मनुष्यजाति के बीच अपने कार्य में एक प्रकार का सुकून महसूस किया। ये सभी घटनाएँ बहुत व्यावहारिक और बहुत स्वाभाविक थी, और जो सुकून परमेश्वर ने महसूस किया था वह बहुत ही प्रामाणिक था। मनुष्यजाति के लिए, हर बार जब भी परमेश्वर के कार्य का एक नया चरण पूरा होता है, और हर बार जब परमेश्वर संतुष्टि महसूस करता है, ऐसा तब होता है जब मनुष्यजाति परमेश्वर के करीब आ सकती है, और जब लोग उद्धार के निकट आ सकते हैं। परमेश्वर के लिए, यह उसके नए कार्य की शुरूआत भी है, जब उसकी प्रबन्धन योजना एक कदम आगे प्रगति करती है, और इसके अतिरिक्त, जब उसकी इच्छा पूर्ण निष्पादन तक पहुँचती है। मनुष्यजाति के लिए, इस प्रकार के अवसर का आगमन सौभाग्यशाली, और बहुत अच्छा है; उन सबके लिए जो परमेश्वर से उद्धार की प्रतीक्षा करते हैं, यह एक महत्वपूर्ण और आनंदमय समाचार है। जब परमेश्वर कार्य के एक नए चरण को कार्यान्वित करता है, तब वह एक नई शुरूआत करता है, और जब मनुष्यजाति के बीच इस नए कार्य और नई शुरूआत को आरम्भ और प्रस्तुत किया जाता है, तो ऐसा तब होता है जब इस कार्य के चरण के परिणाम को पहले से ही निर्धारित कर दिया जाता है, और इसे पूर्ण कर लिया जाता है, और परमेश्वर पहले से ही उसके प्रभावों और परिणाम को देख लेता है। ऐसा भी तब होता है जब ये प्रभाव परमेश्वर को सन्तुष्टि महसूस कराते हैं, और उसका हृदय, वास्तव में, प्रसन्न होता है। क्योंकि, परमेश्वर की नज़रों में, उसने पहले से ही उन लोगों को देख और निर्धारित कर दिया है जिन्हें वह ढूँढ़ रहा है, और पहले से ही इस समूह को प्राप्त कर लिया है, एक ऐसा समूह जो उसके कार्य को सफल करने में और उसे सन्तुष्टि प्रदान करने में समर्थ है, परमेश्वर आश्वस्त महसूस करता है, वह अपनी चिन्ताओं को एक ओर रख देता है, और वह प्रसन्नता महसूस करता है। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर का देह मनुष्यों के बीच एक नया कार्य आरम्भ करने में समर्थ है, और वह उस कार्य को करना आरम्भ कर देता है जिसे उसे बिना किसी अड़चन के अवश्य करना चाहिए, और जब उसे महसूस होता है कि सब कुछ पूर्ण किया जा चुका है, तो उसने अन्त को पहले से ही देख लिया होता है। और इस अन्त के कारण वह सन्तुष्ट है, प्रसन्न हृदय वाला है। परमेश्वर की प्रसन्नता किस प्रकार व्यक्त होती है? क्या तुम लोग कल्पना कर सकते हो कि क्या उत्तर हो सकता है? क्या परमेश्वर रोए? क्या परमेश्वर रो सकता है? क्या परमेश्वर अपने हाथों से ताली बजा सकता है? क्या परमेश्वर नृत्य कर सकता है? क्या परमेश्वर गाना गा सकता है? वह गीत कौन सा होगा? निस्संदेह परमेश्वर एक सुन्दर और द्रवित कर देने वाला गीत गा सकता है, ऐसा गीत जो उसके हृदय के आनन्द और प्रसन्नता को व्यक्त कर सकता है। वह उसे मनुष्यजाति के लिए गा सकता है, उसे अपने आप के लिए गा सकता है, और सभी चीज़ों के लिए गा सकता है। परमेश्वर की प्रसन्नता किसी भी तरीके से व्यक्त हो सकती है—यह सब कुछ सामान्य है क्योंकि परमेश्वर के पास आनन्द और दुःख है, और उसकी विभिन्न भावनाओं को विभिन्न तरीकों से व्यक्त किया जा सकता है। यह उसका अधिकार है, और कुछ भी अधिक सामान्य और उचित नहीं हो सकता है। लोगों को इस बारे में कुछ अन्य नहीं सोचना चाहिए। परमेश्वर से यह कहते हुए कि उसे यह नहीं करना चाहिए या वह नहीं करना चाहिए, उसे इस तरह से कार्य नहीं करना चाहिए या उस तरह से कार्य नहीं करना चाहिए, उसकी खुशी या उसकी किसी भी अन्य भावना वो सीमित करने के लिए कहते हुए, तुम लोगों को परमेश्वर पर “वशीकरण मंत्र”[क] उपयोग करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। लोगों के हृदयों में परमेश्वर प्रसन्न नहीं हो सकता है, वह आँसू नहीं बहा सकता है, वह विलाप नहीं कर सकता है—वह किसी मनोभाव को व्यक्त नहीं कर सकता है। जिन बातों के माध्यम से हमने इन दोनों बार संवाद किया है, उससे मैं यह विश्वास करता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर को अब और इस तरह से नहीं देखोगे, बल्कि परमेश्वर को कुछ स्वतन्त्रता और राहत लेने दोगे। यह एक बहुत अच्छी बात है। भविष्य में यदि तुम लोग सचमुच में परमेश्वर की उदासी को महसूस कर पाओ जब तुम उसकी उदासी के बारे में सुनो, और तुम लोग सचमुच में उसकी प्रसन्नता को महसूस कर पाओ जब तुम लोग उसकी प्रसन्नता के बारे में सुनो—तो कम से कम, तुम लोग स्पष्ट रूप से यह जानने और समझने में समर्थ हो कि क्या चीज़ परमेश्वर को प्रसन्न करती है और क्या चीज़ उसे उदास करती है—जब तुम उदास महसूस कर पाते हो क्योंकि परमेश्वर उदास है, और तुम प्रसन्न महसूस कर पाते हो क्योंकि परमेश्वर प्रसन्न है, तो उसने तुम्हारे हृदय को पूरी तरह से प्राप्त कर लिया होगा और उसके साथ अब और कोई बाधा नहीं होगी। तुम मानवीय कल्पनाओं, धारणाओं, और ज्ञान से परमेश्वर को अब और विवश करने की कोशिश नहीं करोगे। उस समय, परमेश्वर तुम्हारे हृदय में जीवित और जीवंत होगा। वह तुम्हारे जीवन का परमेश्वर होगा और तुम्हारी हर चीज़ का स्वामी होगा। क्या तुम्हारी इस प्रकार की आकांक्षा है। क्या तुम लोगों को विश्वास है कि तुम लोग इसे प्राप्त कर सकते हो?

— “वचन देह में प्रकट होता है” में “परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III” से उद्धृत

 

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क्या आप जानते हैं? परमेश्वर काफ़ी समय पहले गुप्त रूप से आया था

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“यदि तू जागृत न रहेगा तो मैं चोर के समान आ जाऊँगा, और तू कदापि न जान सकेगा कि मैं किस घड़ी तुझ पर आ पड़ूँगा” (प्रकाशितवाक्य 3:3)।
परमेश्वर कहते हैं, “उषाकाल में, किसी को भी बताए बिना, परमेश्वर पृथ्वी पर आया और देह में अपना जीवन शुरू किया। लोग इस क्षण से अनभिज्ञ थे। कदाचित वे सब घोर निद्रा में थे, कदाचित बहुत से लोग जो सतर्कतापूर्वक जागे हुए थे वे प्रतीक्षा कर रहे थे, और कदाचित कई लोग स्वर्ग के परमेश्वर से चुपचाप प्रार्थना कर रहे थे। फिर भी इन सभी कई लोगों के बीच, कोई नहीं जानता था कि परमेश्वर पहले से ही पृथ्वी पर आ चुका है” (“कार्य और प्रवेश (4)”)।

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यीशु मसीह की वापसी के स्वागत का कठिन अनुभव

ऑनलाइन सभा में शामिल होने से मैंने सिंचन पाया

मैंने कई साल पहले अपने परिवार के संग यीशु मसीह पर विश्वास करना शुरू किया था। 2017 में, अपने काम के चलते, मैं बहुत बार सभाओं में नहीं जा पाता था। जिस कारण मुझे लगा कि मेरी आत्मा डूब रही है। जब भी उन चीजों से मेरा सामना होता, जो मेरी पसंद की नहीं होती थीं, तो मेरा गुस्सैल स्वभाव खुलकर सामने आ जाता था। हालाँकि दिल ही दिल में मैं खुद से नफरत करता था, फिर भी मैं अपनी भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर पाता था। इसलिए मैंने प्रभु से प्रार्थना की कि वो मेरे लिए कोई ऐसा इंतज़ाम करें जो मुझे बाइबल अध्ययन की ओर ले जा सके जिससे मुझे उनके साथ अपने रिश्ते को बहाल करने में मदद मिले।

प्रभु से प्रार्थना

एक दिन, मैं फेसबुक ग्रुप में किसी के लिए प्रार्थना कर रहा था, जब उस समूह की एक बहन ने मुझे एक मित्र के रूप में जोड़ा। उसके बाद, हमने आस्था से जुड़ी चीज़ों के बारे में ऑनलाइन बातचीत करना शुरू कर दिया। वो बहन बाइबल के बारे में बहुत कुछ जानती थी और उसकी संगति बहुत रोशन करने वाली थी, इसलिए मैं प्रभु का बहुत आभारी था कि मेरी आत्मा को एक बार फिर सिंचन प्राप्त हो रहा है।एक बार, बहन ने मुझे एक धर्मोपदेश सुनने के लिए आमंत्रित किया, और मैं खुशी से सहमत हो गया। धर्मोपदेश के दौरान, एक भाई ने बाइबल के आधार पर हमें मानवजाति के भ्रष्टाचार की उत्पत्ति के बारे में बताया और बताया कि किस तरह के लोग स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं। उसका उपदेश पादरियों की तुलना में अधिक प्रबुद्ध करने वाला था और सुनते हुए मेरा हृदय प्रकाश से भर गया, इसलिए मुझे भाई के उपदेश सुनना पसंद आया। पढना जारी रखे

Christian movie in hindi अंश 4 : “परमेश्वर में आस्था” – क्या बाइबल में विश्वास प्रभु में विश्वास करने के समान है?

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धार्मिक संसार में अधिकांश लोग यह मानते हैं कि बाइबल ईसाई धर्म की कसौटी है, व्यक्ति को बाइबल का पालन करना चाहिए तथा प्रभु में व्यक्ति के विश्वास का आधार पूरी तरह से बाइबल में होना चाहिए, और अगर कोई बाइबल से अलग होता है तो उसे विश्वासी नहीं समझा जाएगा। इसलिए क्या प्रभु में विश्वास रखना और बाइबल में विश्वास रखना एक ही बात है? बाइबल और प्रभु के बीच वास्तव में क्या संबंध है? एक बार प्रभु यीशु ने प्राचीन यहूदी समुदाय को इन शब्दों के बारे में फटकार लगाई थी, “तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है; और यह वही है जो मेरी गवाही देता है; फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते।” (यूहन्ना 5 : 39-40) (© BSI) बाइबल मात्र परमेश्वर की गवाही है, परंतु इसमें अनन्त जीवन नहीं है। केवल परमेश्वर ही सत्य, मार्ग, और जीवन है। उस मामले में, हम बाइबल को किस नज़र से देखें कि वह प्रभु की इच्छा के अनुरूप हो?

बाइबल को परिभाषित करो — ईश्वर के कार्य को जानना-इसे सही से पढ़ना

परमेश्वर के दैनिक वचन | “परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III” | अंश 65

(मत्ती 12:1) उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से होकर जा रहा था, और उसके चेलों को भूख लगी तो वे बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।

(मत्ती 12:6-8) पर मैं तुम से कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इसका अर्थ जानते, “मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं,” तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है।

आओ पहले हम इस अंश को देखें: “उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से होकर जा रहा था, और उसके चेलों को भूख लगी तो वे बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।”

हमने इस अंश को क्यो चुना है? इसका परमेश्वर के स्वभाव से क्या सम्बन्ध है? इस पाठ में, पहली चीज़ जो हम जानते हैं वह यह है कि वह सब्त का दिन था, परन्तु प्रभु यीशु बाहर गया और अपने चेलों को अनाज के खेतों में ले गया। इस से ज्यादा “उग्र” क्या हो सकता है कि वे “बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।” व्यवस्था के युग में, यहोवा परमेश्वर की व्यवस्था थी कि वे सब्त के दिन यों ही बाहर नहीं जा सकते थे और किसी गतिविधि में भाग नहीं ले सकते थे—बहुत सी ऐसी चीज़ें थीं जिन्हें सब्त के दिन नहीं किया जा सकता था। प्रभु यीशु की तरफ से यह कार्य उनके लिए पेचीदा था जो एक लम्बे समय से व्यवस्था के अधीन जीवन बिता रहे थे, और इस ने आलोचना को भी भड़काया था। उनके भ्रम और जो यीशु ने किया था उस पर उन्हों ने किस प्रकार बात की उस के विषय में, हम फिलहाल उसे दर किनार करेंगे और पहले यह चर्चा करते हैं कि प्रभु यीशु ने, सभी दिनों को छोड़कर, सिर्फ सब्त के दिन ही ऐसा करने का चुनाव क्यों किया था, और वह इस कार्य के द्वारा लोगों से क्या कहना चाहता था जो व्यवस्था के अधीन रहते थे। यह इस अंश और परमेश्वर के स्वभाव के बीच एक मेल है जिसके बारे में मैं तुम से बात करना चाहता हूँ।

जब प्रभु यीशु मसीह आया, तो उसने लोगों से बात करने के लिए अपने व्यावहारिक कार्यों का प्रयोग कियाः परमेश्वर ने व्यवस्था के युग को अलविदा किया और नए कार्य का प्रारम्भ किया, और इस नए कार्य को सब्त का पालन करने की जरूरत नहीं थी; जब परमेश्वर सब्त के दिन की सीमाओं से बाहर आ गया, तो यह उसके नए कार्य का बस एक पूर्वानुभव था, और सचमुच में उसका महान कार्य लगातार जारी रहने वाला था। जब प्रभु यीशु ने अपना कार्य प्रारम्भ किया था, तो उसने पहले से ही व्यवस्था की जंज़ीरों को पीछे छोड़ दिया था, और उस युग की विधियों और सिद्धांतों को तोड़ दिया था। उस में, व्यवस्था से जुड़ी किसी भी चीज़ का निशान नहीं था; उसने उसे पूर्णत: उतार कर फेंक दिया था और आगे से उसका अनुसरण नहीं किया था, और उसने आगे से मानव जाति से उस का अनुसरण करने की अपेक्षा नहीं की थी। इस प्रकार तुम यहाँ देखते हो कि प्रभु यीशु सब्त के दिन अनाज के खेतों से होकर गुज़रा, और प्रभु ने आराम नहीं किया, किन्तु बाहर काम कर रहा था। उसका यह कार्य लोगों की धारणाओं के लिए एक आघात था और उन्हें यह सन्देश दिया कि वह आगे से व्यवस्था के अधीन जीवन नहीं बिताएगा, और यह कि उसने सब्त की सीमाओं को छोड़ दिया है और उसने मानव जाति के सामने और उनके मध्य एक नई तस्वीर को, एक नए कार्यशैली के साथ प्रकट किया है। उसके इस कार्य ने लोगों को यह बताया कि वह अपने साथ एक नया कार्य लेकर आया है जो व्यवस्था से दूर जाने और सब्त से बाहर जाने से प्रारम्भ हुआ था। जब परमेश्वर ने अपना नया कार्य प्रारम्भ किया, तो वह आगे से भूतकाल से चिपका नहीं रहा, और वह आगे से व्यवस्था के युग की विधियों के विषय में चिन्तित नहीं था। ना ही वह पिछले युग के अपने कार्य से प्रभावित हुआ था, परन्तु उसने सब्त के दिन में भी सामान्य रूप से कार्य किया था और जब उसके चेले भूखे थे, वे अनाज की बालें तोड़कर खा सकते थे। यह सब कुछ परमेश्वर की निगाहों में बिल्कुल सामान्य था। परमेश्वर के पास बहुत सारे कार्यों के लिए जिन्हें वह करना चाहता है और बहुत सारी चीज़ों के लिए जिन्हें वह कहना चाहता है एक नई शुरूआत हो सकती है। एक बार जब उसने एक नई शुरूआत कर दी, वह ना तो फिर से अपने पिछले कार्य का जिक्र करता है और ना ही उसे जारी रखता है। क्योंकि परमेश्वर के पास उसके कार्य के लिए स्वयं के सिद्धांत हैं। जब वह नया कार्य शुरू करना चाहता है, तो यह तब होता है जब वह मानव जाति को अपने कार्य के एक नए स्तर में पहुँचाना चाहता है, और जब उसका कार्य सब से ऊँचे मुकाम में प्रवेश कर लेता है। यदि लोग लगातार पुरानी कहावत या विधियों के अनुसार काम करते रहेंगे या उन्हें निरन्तर मज़बूती से पकड़ें रहेंगे, तो वह इसका उत्सव नहीं मनाएगा और इस की प्रशंसा नहीं करेगा। यह इसलिए है क्योंकि वह पहले से ही एक नए कार्य को लेकर आ चुका है, और अपने कार्य में एक नए मुकाम में पहुँच चुका है। जब वह एक नए कार्य को आरम्भ करता है, वह मानव जाति को पूर्णतः नए रूप में दिखाई देता है, पूर्णतः नए कोण से, और पूर्णतः नए तरीके से ताकि लोग उसके स्वभाव के भिन्न भिन्न पहलुओं और जो उसके पास है तथा जो वह है उस को देख सकें। यह उसके नए कार्य में उसके अनेक लक्ष्यों में से एक लक्ष्य है। परमेश्वर पुराने को थामे नहीं रहता है या जर्जर मार्ग को नहीं लेता है; जब वह कार्य करता है और बोलता है तो यह उतना निषेधात्मक नहीं होता है जितना लोग कल्पना करते हैं। परमेश्वर में, सभी आज़ाद और छुड़ाए गए हैं, और कुछ भी निषेधात्मकता, या विवशता नहीं है—जो वह मानव जाति के लिए लेकर आता है वह सम्पूर्ण आज़ादी और छुटकारा है। वह एक जीवित परमेश्वर है, एक ऐसा परमेश्वर जो विशुद्ध रूप से, और सचमुच में अस्तित्व में है। वह एक कठपुतली या मिट्टी की कारीगरी नहीं है, और वह उन मुर्तियों से बिल्कुल भिन्न है जिन्हें लोग पवित्र मानते हैं और उन की पूजा करते हैं। वह जीवित और जीवन्त है और उसके कार्य और वचन मनुष्यों के लिए जो लेकर आते हैं वे हैं सम्पूर्ण जीवन और ज्योति, सम्पूर्ण स्वतन्त्रता और छुटकारा, क्योंकि वह उस सच्चाई, जीवन, और मार्ग को थामे रहता है—और उसके किसी भी कार्य में उसे किसी भी चीज़ के द्वारा विवश नहीं किया जा सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि लोग क्या कहते हैं और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे उसके नए कार्य को किस प्रकार देखते हैं या किस प्रकार उस का आँकलन करते हैं, वह बिना किसी पछतावे के अपने कार्य को पूरा करेगा। वह किसी की विचार धारणा या उसके कार्य और वचनों की ओर उठती हुई ऊँगलियों, या अपने नए कार्य के लिए उनके कठोर विरोध और प्रतिरोध की भी चिन्ता नहीं करेगा। समूची सृष्टि में कोई भी नहीं है जो उसके कार्य को कलंकित करने, या छिन्न भिन्न या तोड़फोड़ करने के लिए या जो परमेश्वर करता है उसे नापने या उसे परिभाषित करने के लिए मानवीय तर्क, या मानवीय कल्पनाओं, ज्ञान, या नैतिकता का प्रयोग कर सके। उसके कार्य में कोई निषेधात्मकता नहीं है, और किसी मनुष्य, चीज़ या पदार्थ के द्वारा उसे बाध्य नहीं किया जाएगा, और उसे किसी प्रचण्ड शक्ति के द्वारा छिन्न भिन्न नहीं किया जाएगा। अपने इस नए कार्य में, वह सर्वदा के लिए एक विजयी राजा है, और किसी भी प्रकार की प्रचण्ड ताकतों और झूठी शिक्षाओं और मानव की अशुद्धियों को उसके चरणों की चौकी के नीचे कुचल दिया गया है। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह अपने कार्य के किस नए स्तर पर काम कर रहा है, इसे मानव जाति के बीच में विकसित एवं विस्तारित करना होगा, उसे समूचे विश्व में तब तक बिना किसी बाधा के पूरा करना होगा जब तक उसका महान कार्य पूर्ण ना हो जाए। यह परमेश्वर की सर्वसामर्थता और बुद्धिमत्ती है, और उस का अधिकार और सामर्थ है। इस प्रकार, प्रभु यीशु मसीह खुलकर बाहर जा सकता था और सब्त के दिन कार्य कर सकता था क्योंकि उसके हृदय में कोई नियम नहीं थे, और वहाँ मानव जाति से उत्पन्न कोई ज्ञान और सिद्धांत नहीं था। जो उसके पास था वह परमेश्वर का नया कार्य और उस का मार्ग था, और उस का कार्य मानव जाति को स्वतन्त्र करना था, उसे मुक्त करना था, उन्हें ज्योति में बने रहने की अनुमति देना था, और उन्हें जीने की अनुमति देना था। और वे जो मूर्तियों या झूठे ईश्वरों की पूजा करते हैं हर दिन शैतान के बन्धनों में जीते हैं, सभी प्रकार के नियमों और समाज से बहिष्कृत जीवनशैलियों के द्वारा बन्धे हुए हैं—आज एक चीज़ प्रतिबन्धित है, कल कोई दूसरी चीज़ होगी—उन के जीवन में कोई स्वतन्त्रता नहीं है। वे जंज़ीरों में जकड़े हुए कैदियों के समान हैं जिन के पास बोलने की कोई आज़ादी नहीं है। “निषेध” किसे दर्शाता है? यह विवशता, बन्धनों, और बुराई को दर्शाता है। जैसे ही एक व्यक्ति एक मूर्ति की पूजा करता है, वे एक झूठे ईश्वर की पूजा कर रहे हैं, वे एक बुरी आत्मा की पूजा कर रहे हैं। प्रतिबन्ध इस के साथ आता है। तुम इसे या उसे नहीं खा सकते हो, आज तुम बाहर नहीं जा सकते हो, कल तुम अपना चूल्हा नहीं जला सकते हो, अगले दिन तुम नए घर में नहीं जा सकते हो, शादी ब्याह तथा अन्तिम क्रिया, और यहाँ तक कि बच्चे को जन्म देने के लिए भी कुछ निश्चित दिनों को ही चुनना होगा। इसे क्या कहते हैं? इसे ही प्रतिबन्ध कहते हैं; यह मानवजाति का बंधन है, और ये शैतान की जंज़ीरें हैं और दुष्ट आत्माएँ इन्हें नियन्त्रित करते हैं, और उनके हृदयों और शरीरों को बन्धनों में बाँधते हैं। क्या ऐसे प्रतिबन्ध परमेश्वर के साथ साथ बने रहते हैं? जब परमेश्वर की पवित्रता की बात करते हैं, तो तुम्हें पहले यह सोचना चाहिएः कि परमेश्वर के साथ कुछ भी प्रतिबन्धित नहीं है। परमेश्वर के पास उसके वचनों और कार्य के लिए सिद्धांत हैं, परन्तु कुछ भी प्रतिबन्ध नहीं है, क्योंकि परमेश्वर स्वयं सत्य, मार्ग, और जीवन है।

— ‘परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III’ से उद्धृत

आज का बाइबल वचन—रोज अवश्य-पढ़ें—प्रभु को जानने की ओर आपको लाना
प्रभु यीशु ने सब्त क्यों नहीं रखा? ईसाई अवश्य-पढ़ें
सब्त के दिन की सीमाओं से प्रभु यीशु के बाहर आने के पीछे का रहस्य क्या है?

यीशु मसीह प्रचार। आपको नई रोशनी देना। आपकी आत्मा को पोषण देना

नूह के दिन आ गए हैं: परमेश्वर के प्रकटन की तलाश कैसे करें

नूह के दिन आ गये हैं: यह क्या संकेत है?

नूह के दिन आ गये हैं

जब हम नूह के दिनों के इंसान की बात करते हैं, हर कोई जानता है कि हत्या और आगजनी, लूट और चोरी, और अनैतिकता उस समय के लोगों का दूसरा स्वभाव बन गया था। वे परमेश्वर से दूर हो गये और उसके वचनों पर ध्यान नहीं दिया, और अंत में परमेश्वर ने बड़े जलजले से उन्हें नष्ट कर दिया। फिर हम आज की दुनिया के लोगों को देखते हैं: वे बुराई पसंद करते हैं, और किसी भी शहर की सडकों और गलियों में केरोके बार, फुट मसाज पार्लर्स, शराबखाने और डांस क्लब जैसी जगहें हर कोई देख सकता है; लोग खाते, पीते और मजे लेते, देह के आनंद में लिप्त रहते हैं; ज्यादातर लोग प्रसिद्धि, लाभ और पद के लिए एक दूसरे से होड़ करते हैं, एक दूसरे से लड़ते हैं, एक दूसरे के खिलाफ षडयंत्र करते हैं, और एक दूसरे को धोखा देते हैं, दोस्त और रिश्तेदार भी अपवाद नहीं हैं। सभी लोग सच से तंग होते हैं, वे अनीति से प्यार करते हैं और पाप में जीते हैं; कोई भी सत्य की तलाश या सच्चे मार्ग को खोजने की पहल नहीं करता और यहाँ तक कि वे खुले तौर पर परमेश्वर को नकारते और उसका विरोध करते हैं। सम्पूर्ण मानवजाति शैतान की प्रभुता में रहती है, यहाँ तक कि जो लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, वे भी सांसारिक प्रवृतियों को निभाने के लिए खुद का स्तर गिरा लेते हैं। पढना जारी रखे

Hindi Christian Song | देहधारी परमेश्वर सबसे प्रिय है (Lyrics)

Hindi Christian Song | देहधारी परमेश्वर सबसे प्रिय है (Lyrics)

परमेश्वर ने देह बनकर, इंसानों के बीच रहकर,
देखी उनकी बुराई, और हालात ज़िंदगी के।
देहधारी परमेश्वर ने महसूस कीं इंसान की मजबूरियां,
इंसान की दयनीयता, इंसान का दुख-दर्द।
देह में परमेश्वर अपने सहज ज्ञान से, हो गया ज़्यादा दयालु
मानव की हालत के लिए, हो गया ज़्यादा चिंतित अपने भक्तों के लिए
अपने भक्तों के लिये।
अपने भक्तों के लिये।
पढना जारी रखे

मानव का अस्तित्व परमेश्वर पर निर्भर है | Hindi Christian Song With Lyrics

 

परमेश्वर का अंतिम कार्य सिर्फ़ सज़ा देना नहीं है,
काम है उसका इंसान को मंज़िल तक पहुँचाना,
और जो कुछ भी किया परमेश्वर ने, हर किसी से उसकी पहचान पाना।
परमेश्वर चाहता है हर इंसान देखे जो कुछ किया उसने वह है सही,
और जो कुछ किया उसने वह है उसके स्वभाव की अभिव्यक्ति।
बनाया नहीं इंसान ने इंसान को, न ही प्रकृति ने बनाया इंसान को।
बल्कि बस परमेश्वर ही है जो हर जीवित आत्मा
और हर चीज़ को देता है पोषण।
परमेश्वर के बिना मानव जाति का होगा नाश,
होगी वह तबाही से त्रस्त,
कोई नहीं देखेगा इस हरियाले विश्व को दुबारा।
कोई नहीं देखेगा सूरज और चाँद की ख़ूबसूरती। पढना जारी रखे

हम हर बात में पादरियों और एल्डर्स की आज्ञा मानते हैं और समर्पण करते हैं, क्या यह परमेश्वर के आगे समर्पण करने के समान है? क्या इस ढंग से परमेश्वर में विश्वास करना उद्धार प्राप्त करने का मार्ग है?

परमेश्वर के वचन से जवाब:

जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें परमेश्वर की आज्ञा माननी चाहिए और उसकी आराधना करनी चाहिए। तुम्हें किसी व्यक्ति को ऊँचा नहीं ठहराना चाहिए या किसी व्यक्ति पर श्रद्धा नहीं रखनी चाहिए; तुम्हें पहला स्थान परमेश्वर को, दूसरा स्थान उन लोगों को जिनकी तुम श्रद्धा करते हो, और तीसरा स्थान अपने आपको नहीं देना चाहिए। किसी भी व्यक्ति को तुम्हारे हृदय में कोई स्थान नहीं लेना चाहिए, और तुम्हें लोगों को—विशेष रूप से उन्हें जिनका तुम सम्मान करते हो—परमेश्वर के समतुल्य, उसके बराबर नहीं मानना चाहिए। यह परमेश्वर के लिए असहनीय है। पढना जारी रखे

खोया फिर पाया

अब, प्रमुख नेटवर्क प्लेटफ़ॉर्म यह गवाही दे रहे हैं कि प्रभु वापस आ चुका है, वह अंतिम दिनों का मसीह है, सर्वशक्तिमान परमेश्वर। बहुत से लोग परमेश्वर के अंतिम समय के काम की जांच करने वाले हैं, मगर, जब वह कुछ व्याख्याओ को देखते हैं जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर के चर्च की निंदा और बदनाम करती हैं, तो वे संकोच करना शुरू कर देते हैं। यदि हम अफवाहों का पालन करते हैं तो इस तरह हम प्रभु के स्वागत का अवसर गँवा देते है , तो यह जीवन भर के लिए पछतावा होगा! प्रभु में एक भाई है। उसे भी कभी ऐसा ही अनुभव हुआ। अपने अनुसरण और जांच के माध्यम से, वह अंततः उन व्याख्याओ को साबित करता है कि वह सभी अफवाहें हैं और सर्वशक्तिमान ईश्वर के अंत समय के काम को स्वीकार करता हैं और प्रभु का स्वागत करने में सफल होता हैं! आइए एक साथ उसका अनुभव देखें!

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