प्रभु यीशु ने कहा था वह जैसे गया था वैसे ही वापस लौटेगा—इसका मतलब क्या है?

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परमेश्वर कहते हैं, “यीशु एक सफेद बादल पर सवार हो कर चला गया—यह तथ्य है—किन्तु वह मनुष्यों के बीच एक सफेद बादल पर सवार हो कर कैसे वापस आ सकता है और अभी भी उसे यीशु कहा जा सकता है? यदि वह वास्तव में बादल पर आया होता, तो मनुष्य उसे पहचानने में कैसे विफल होता? क्या दुनिया भर के लोग उसे नहीं पहचानते? उस स्थिति में, क्या यीशु एकमात्र परमेश्वर नहीं होता? उस स्थिति में, परमेश्वर की छवि एक यहूदी का रूप-रंग होती, और इसके अलावा वह हमेशा ऐसी ही रहती। यीशु ने कहा था कि वह उसी तरह से आएगा जैसे वह गया था, किन्तु क्या तुम उसके वचनों के सही अर्थ को जानते हो? क्या ऐसा हो सकता है कि उसने तुम लोगों के इस समूह से कहा था? तुम केवल इतना ही जानते हो कि वह बादल पर सवार हो कर उसी तरह से आएगा जैसे वह गया था, किन्तु क्या तुम जानते हो कि स्वयं परमेश्वर वास्तव में अपना कार्य कैसे करता है? यदि तुम सच में देखने में समर्थ होते, तब यीशु के द्वारा बोले गए वचनों को कैसे समझाया जाता? उसने कहा, जब अंत के दिनों में मनुष्य का पुत्र आएगा, तो उसे स्वयं ज्ञात नहीं होगा, फ़रिश्तों को ज्ञात नहीं होगा, स्वर्ग के दूतों को ज्ञात नहीं होगा, और समस्त मनुष्यजाति को ज्ञात नहीं होगा। केवल परमपिता को ज्ञात होगा, अर्थात्, केवल पवित्रात्मा को ही ज्ञात होगा। यहाँ तक कि स्वयं मनुष्य का पुत्र भी नहीं जानता है, फिर भी तुम देख और जान पाते हो। यदि तुम जानने और अपनी स्वयं की आँखों से देखने में समर्थ होते, तब क्या ये व्यर्थ में बोले गए नहीं होते? और उस समय यीशु ने क्या कहा? ‘उस दिन और उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता, न स्वर्ग के दूत और न पुत्र, परन्तु केवल पिता। जैसे नूह के दिन थे, वैसा ही मनुष्य के पुत्र का आना भी होगा। … इसलिये तुम भी तैयार रहो, क्योंकि जिस घड़ी के विषय में तुम सोचते भी नहीं हो, उसी घड़ी मनुष्य का पुत्र आ जाएगा।’ जब वह दिन आ जाएगा, तो स्वयं मनुष्य के पुत्र को उसका पता नहीं चलेगा। मनुष्य का पुत्र देहधारी परमेश्वर के देह का संकेत करता है, जो कि एक सामान्य और साधारण व्यक्ति है। यहाँ तक कि मनुष्य का पुत्र स्वयं नहीं जानता है, तो तुम कैसे जान सकते हो? यीशु ने कहा था कि वह वैसे ही आएगा जैसे वह गया था। जब वह आता है, तो वह स्वयं भी नहीं जानता है, तो क्या वह तुम्हें अग्रिम में सूचित कर सकता है? क्या तुम उसका आगमन देखने में सक्षम हो? क्या यह एक मज़ाक नहीं है?” (“परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)”)।

 

यीशु मसीह का दूसरा आगमन | उनका स्वागत करने के लिए तैयार रहें | जानने के लिए अभी क्लिक करें। 

सभी संकेतों से ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर के आने का समय बहुत पहले हो गया था।

 हम परमेश्वर का स्वागत कैसे कर सकते हैं? यह अनुपृष्ठ हमें मार्ग दिखाएगा।

पवित्र आत्मा के कार्य को कोई कैसे प्राप्त कर सकता है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

पवित्र आत्मा का कार्य दिन ब दिन बदलता जाता है, हर एक कदम के साथ ऊँचा उठता जाता है; आने वाले कल का प्रकाशन आज से भी कहीं ज़्यादा ऊँचा होता है, कदम दर कदम और ऊपर चढ़ता जाता है। जिस कार्य के द्वारा परमेश्वर मनुष्य को सिद्ध करता है वह ऐसा ही है। यदि मनुष्य उस गति से चल न पाए, तो उसे किसी भी समय पीछे छोड़ा जा सकता है। यदि मनुष्य के पास आज्ञाकारी हृदय न हो, तो वह अंत तक अनुसरण नहीं कर सकता है। पूर्व का युग गुज़र गया है; यह एक नया युग है। और नए युग में, नया कार्य करना होगा। विशेषकर अंतिम युग में जिसमें मनुष्य को सिद्ध किया जाएगा, परमेश्वर पहले से ज़्यादा तेजी से नया कार्य करेगा। इसलिए, अपने हृदय में आज्ञाकारिता को धारण किए बिना, मनुष्य के लिए परमेश्वर के पदचिह्नों का अनुसरण करना कठिन होगा। परमेश्वर किसी भी नियम का पालन नहीं करता है, न ही वह अपने कार्य के किसी स्तर को अपरिवर्तनीय मानता है। बल्कि, वह जिस कार्य को करता है वह हमेशा नया और हमेशा ऊँचा होता है। उसका कार्य हर एक कदम के साथ और भी अधिक व्यावहारिक होता जाता है, और मनुष्य की वास्तविक ज़रूरतों के और भी अधिक अनुरूप होता जाता है। जब मनुष्य इस प्रकार के कार्य का अनुभव करता है केवल तभी वह अपने स्वभाव के अंतिम रूपान्तरण को हासिल कर पाता है। जीवन के बारे में मनुष्य का ज्ञान और सर्वाधिक उच्च स्तरों तक पहुँच जाता है, इसलिए इसी तरह से परमेश्वर का कार्य भी सर्वाधिक उच्च स्तरों तक पहुँच जाता है। केवल इसी तरह से मनुष्य को सिद्ध बनाया जा सकता है और वह परमेश्वर के उपयोग के योग्य हो सकता है। परमेश्वर एक ओर, मनुष्य की अवधारणाओं का सामना करने और उन्हें उलटने के लिए, और दूसरी ओर, उच्चतर तथा और अधिक वास्तविक स्थिति में, परमेश्वर पर विश्वास करने के उच्चतम आयाम में मनुष्य की अगुवाई करने के लिए, इस तरह से कार्य करता है, ताकि अंत में, परमेश्वर की इच्छा पूरी हो सके। वे सभी जो अवज्ञाकारी प्रकृति के हैं जो जानबूझ कर विरोध करते हैं उन्हें परमेश्वर के द्रुतगामी और प्रचंडता से आगे बढ़ते हुए कार्य के इस चरण द्वारा पीछे छोड़ दिया जाएगा; केवल जो स्वेच्छा से आज्ञापालन करते हैं और जो अपने आप को प्रसन्नतापूर्वक दीन बनाते हैं वे ही मार्ग के अंत तक प्रगति कर सकते हैं। इस प्रकार के कार्य में, तुम सभी लोगों को सीखना चाहिए कि समर्पण कैसे करें और अपनी अवधारणाओं को कैसे अलग रखें। तुम लोगों को उस हर कदम पर सतर्क रहना चाहिए जो तुम उठाते हो। यदि तुम लोग लापरवाह हो, तो तुम लोग निश्चित रूप से उनमें से एक बन जाओगे जिसे पवित्र आत्मा द्वारा ठुकराया जाता है, और एक ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो परमेश्वर के कार्य में उसे बाधित करता है। …परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य अलग-अलग अवधियों में भिन्न होता है। यदि तुम एक चरण में बड़ी आज्ञाकारिता दिखाते हो, मगर अगले चरण में कम दिखाते हो या कुछ भी नहीं दिखाते हो, तो परमेश्वर तुम्हें त्याग देगा। जब परमेश्वर यह कदम उठाता है तब यदि तुम परमेश्वर के साथ समान गति से चलते हो, तो जब वह अगला कदम उठाता है तब तुम्हें समान गति से अवश्य चलते रहना चाहिए। केवल तभी तुम ऐसे एक हो जो पवित्र आत्मा के प्रति आज्ञाकारी है। चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें अपनी आज्ञाकारिता में अचल अवश्य बने रहना चाहिए। तुम यूँ ही जब अच्छा लगे तभी आज्ञा नहीं मान सकते हो और जब अच्छा न लगे तब अवज्ञा नहीं कर सकते हो। इस प्रकार की अवज्ञा को परमेश्वर का अनुमोदन नहीं मिलता है। यदि तुम उस नए कार्य के साथ तालमेल नहीं बनाए रख सकते हो, जिसके बारे में मैं संगति करता हूँ, और पूर्व की बातों को लगातार धारण नहीं कर सकते हो, तो तुम्हारे जीवन में प्रगति कैसे हो सकती है? परमेश्वर का कार्य, अपने वचनों के माध्यम से तुम्हारा भरण-पोषण करना है। जब तुम उसके वचनों का पालन करते हो और उन्हें स्वीकार करते हो, तब पवित्र आत्मा निश्चित रूप से तुम में कार्य करेगा। पवित्र आत्मा बिलकुल उसी तरह कार्य करता है जिस तरह से मैं कहता हूँ। जैसा मैंने कहा है वैसा ही करो, और पवित्र आत्मा शीघ्रता से तुम में कार्य करेगा। मैं तुम लोगों के देखने के लिए और तुम लोगों को वर्तमान समय के प्रकाश में लाने के लिए एक नया प्रकाश छोड़ता हूँ। जब तुम इस प्रकाश में चलोगे, तो पवित्र आत्मा तुरन्त ही तुम में कार्य करेगा।

— “वचन देह में प्रकट होता है” में “जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे” से उद्धृत

इस वक्त पवित्र आत्मा जिस मार्ग को अपनाता है वह परमेश्वर के मौजूदा वचन हैं। अतः अगर लोग पवित्र आत्मा के मार्ग पर चलने के इच्छुक हैं, तो उन्हें देहधारी परमेश्वर के मौजूदा वचनों का पालन करना चाहिए, और उन्हें खाना तथा पीना चाहिए। जो कार्य वह करता है वो वचनों का कार्य है, सब कुछ उसके वचनों से शुरू होता है, और सब कुछ उसके वचनों, उसके मौजूदा वचनों, पर स्थापित होता है। चाहे बात परमेश्वर के देहधारण के बारे में निश्चित होने की हो या उसे जानने की, हरेक के लिए उसके वचनों पर अधिक समय देने की आवश्यकता है। अन्यथा लोग कुछ प्राप्त नहीं कर पाएंगे और उनके पास कुछ शेष नहीं रहेगा। सिर्फ परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के परिणामस्वरूप उसे जानने और संतुष्ट करने के आधार पर ही लोग धीरे-धीरे उसके साथ उचित संबंध स्थापित कर सकते हैं। मनुष्य के लिए, परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना तथा उन्हें अभ्यास में लाना ही परमेश्वर के साथ श्रेष्ठ सहयोग है। ऐसे अभ्यास के द्वारा वे परमेश्वर के जन होने की अपनी गवाही में मजबूत खड़े रह पाएंगे। जब लोग परमेश्वर के मौजूदा वचनों को समझते हैं और उसके सार का पालन करने में सक्षम होते हैं, तो वे पवित्र आत्मा द्वारा मार्गदर्शन किए जाने के पथ पर जीवन जीते हैं और वह परमेश्वर द्वारा मनुष्य को सिद्ध करने के सही मार्ग में प्रवेश कर चुके हैं।

— “वचन देह में प्रकट होता है” में “जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वो वे लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं” से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा लोगों से माँग किया जाने वाला सबसे निम्नतम स्तर यह है कि वे अपने हृदयों को परमेश्वर के प्रति खोल सकें। यदि मनुष्य अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दे दे और परमेश्वर से वह कहे जो वास्तव में उसके हृदय में परमेश्वर के लिए है, तो परमेश्वर मनुष्य में कार्य करने के लिए तैयार है; परमेश्वर मनुष्य का विकृत हृदय नहीं चाहता, बल्कि उसका शुद्ध और खरा हृदय चाहता है। यदि मनुष्य सच्चाई के साथ परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय से नहीं बोलता है, तो परमेश्वर मनुष्य के हृदय को स्पर्श नहीं करता या उसके भीतर कार्य नहीं करता।

— “वचन देह में प्रकट होता है” में “प्रार्थना की क्रिया के विषय में” से उद्धृत

तहेदिल से परमेश्वर की आत्मा को स्पर्श करके लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उससे प्रेम करते हैं, और उसे संतुष्ट करते हैं, और इस प्रकार वे परमेश्वर की संतुष्टि प्राप्त करते हैं; जब वे परमेश्वर के वचनों के संपर्क में आते हैं, तो परमेश्वर का आत्मा का उन पर भावनात्मक प्रभाव पड़ता है। यदि तुम एक उचित आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करना चाहते हो और परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध स्थापित करना चाहते हो, तो तुम्‍हें पहले उसे अपना हृदय अर्पित करना होगा, और अपने हृदय को उसके सामने शांत करना होगा। अपने पूरे हृदय को परमेश्वर की स्तुति में डुबोकर ही तुम धीरे-धीरे एक उचित आध्यात्मिक जीवन का विकास कर सकते हो। यदि लोग परमेश्वर को अपना हृदय अर्पित नहीं करते हैं और उस पर पूरी तरह विश्वास नहीं करते हैं, और अगर उनका दिल उन्हें महसूस नहीं करता है और वे परमेश्वर के बोझ को अपना बोझ नहीं मानते हैं, तो जो कुछ भी वे कर रहे हैं उससे केवल परमेश्वर को धोखा दे रहे हैं, और ये धार्मिक व्यक्तियों का केवल व्यवहार है—ये परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं कर सकता है। इस तरह के व्यक्ति से परमेश्वर को कुछ नहीं मिल सकता; इस तरह का व्यक्ति परमेश्वर के काम के पथ में केवल एक विषमता है, परमेश्वर के घर में सजावट के किसी सामान की तरह, जगह लेता हुआ, और बेकार—परमेश्वर के लिए इस तरह का व्यक्ति उपयोगी नहीं है। ऐसे व्यक्ति में, पवित्र आत्मा के काम के लिए कोई अवसर नहीं है, और इससे भी ज़्यादा, ऐसे व्यक्ति में पूर्णता का कोई महत्व नहीं है। ऐसा व्यक्ति एक चलते-फिरते मृत व्यक्ति की तरह है। ऐसे व्यक्ति के भीतर ऐसा कोई भी अंश नहीं बचा है जिसका उपयोग पवित्र आत्मा कर सके—उन सभी का उपयोग शैतान द्वारा किया जा चुका है, उन्हें पूरी तरह शैतान ने दूषित कर दिया है, और उन्हें हटाना परमेश्वर का उद्देश्य है। फिलहाल, पवित्र आत्मा लोगों के गुणों को उजागर करके ही केवल उनका उपयोग नहीं कर रहा है, बल्कि उनकी कमियों में सुधार और परिवर्तन भी कर रहा है। यदि तुम्हारा हृदय परमेश्वर में डूब सकता है और उसके सामने शांत रह सकता है, तो तुम्हारे पास यह अवसर और वह योग्यता होगी कि पवित्र आत्मा तुम्हारा उपयोग करे, पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी को तुम प्राप्त करो, और इससे भी ज़्यादा, तुम्हारे पास अवसर होगा कि पवित्र आत्मा तुम्हारी कमियों को दूर करे। जब तुम अपने हृदय को परमेश्वर के सामने अर्पित करते हो, तो सकारात्मक पहलू में, तुम अधिक गहराई से प्रवेश कर सकोगे और समझ के उच्च स्तर पर पहुंच सकोगे; नकारात्मक पहलू में, तुम अपनी गलतियों और कमियों की अधिक समझ प्राप्त कर सकोगे, तुम परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति करने के लिए ज़्यादा उत्सुक रहोगे, और तुम निष्क्रिय नहीं, बल्कि सक्रिय रूप से प्रवेश करोगे। इसका मतलब होगा कि तुम एक सही व्यक्ति हो।

— “वचन देह में प्रकट होता है” में “परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है” से उद्धृत

पवित्र आत्मा इस सिद्धांत के अनुसार काम करता है: लोगों के सहयोग के माध्यम से, उनके परमेश्वर की सक्रियता से प्रार्थना करने, परमेश्वर को खोजने एवं उसके करीब आने के माध्यम से, परिणामों को प्राप्त किया जा सकता है और पवित्र आत्मा द्वारा उन्हें प्रबुद्ध और रोशन किया जा सकता है। यह ऐसा मामला नहीं है कि पवित्र आत्मा एकतरफ़ा कार्य करता है, या कि मनुष्य एकतरफ़ा कार्य करता है। दोनों ही अपरिहार्य हैं, और लोग जितना अधिक सहयोग करते हैं, और वे जितना अधिक परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों को प्राप्त करने की खोज करते हैं, पवित्र आत्मा का कार्य उतना ही अधिक विशाल होता है। पवित्र आत्मा के कार्य के साथ जोड़ा गया केवल लोगों का वास्तविक सहयोग ही, परमेश्वर के वचनों के वास्तविक अनुभवों एवं सारभूत ज्ञान को उत्पन्न कर सकता है। धीरे-धीरे, इस तरीके से अनुभव करने के माध्यम से, अंततः एक पूर्ण व्यक्ति बनता है। परमेश्वर अलौकिक चीज़ें नहीं करता है; लोगों की धारणाओं में, परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, और सब कुछ परमेश्वर के द्वारा किया जाता है—परिणामस्वरूप लोग निष्क्रियता से प्रतीक्षा करते हैं, परमेश्वर के वचनों को नहीं पढ़ते हैं या प्रार्थना नहीं करते हैं, और मात्र पवित्र आत्मा के स्पर्श की प्रतीक्षा करते हैं। हालाँकि, जिनके पास सही समझ है, वे यह विश्वास करते हैं कि: परमेश्वर के कार्यकलाप केवल वहाँ तक जा सकते हैं जहाँ तक मेरा सहयोग होता है, और मुझ पर परमेश्वर के कार्य का जो प्रभाव पड़ता है वह इस बात पर निर्भर करता है कि मैं किस प्रकार सहयोग करता हूँ। जब परमेश्वर बोलता है, तो परमेश्वर के वचनों को ढूँढ़ने और उनकी ओर प्रयत्न करने के लिए मुझे वह सब करना चाहिए जो मैं कर सकता हूँ; यही है वह जो मुझे प्राप्त करना चाहिए।

— “वचन देह में प्रकट होता है” में “वास्तविकता को कैसे जानें” से उद्धृत

अनुभव से यह देखा जा सकता है कि सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक है परमेश्वर के सामने अपने दिल को शांत करना। यह एक ऐसा मुद्दा है जो लोगों के आध्यात्मिक जीवन से और उनके जीवन के विकास से संबंधित है। तुम्हारा दिल जब परमेश्वर के सामने शांत रहेगा, केवल तभी सत्य की तुम्हारी खोज और तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तनों का फल प्राप्त होगा। तुम परमेश्वर के सामने बोझ से दबे हुए आते हो और तुम हमेशा महसूस करते हो कि तुम्हारे जीवन में बहुत कमियाँ हैं, ऐसे कई सत्य हैं जिन्हें तुमको जानना है, ऐसी कई वास्तविकताएं हैं जो तुम्‍हें अनुभव करने की आवश्यकता है, और यह कि तुमको अपनी हर चिंता परमेश्वर की इच्छा पर छोड़ देनी चाहिए—ये बातें हमेशा तुम्हारे दिमाग़ में चलती रहती हैं, और ऐसा लगता है जैसे ये बातें तुम पर इतना दबाव डाल रही हैं कि तुम्हारे लिए साँस लेना मुश्किल हो गया है, और यही वजह है कि तुम्हारा दिल भारी-भारी महसूस करता है (लेकिन एक नकारात्मक तरह से नहीं)। केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के वचनों की प्रबुद्धता को स्वीकार करने और परमेश्वर की आत्मा से प्रेरित होने के योग्य हैं। यह उनके बोझ की वजह से है, क्योंकि उनका दिल भारी-भारी महसूस करता है, और, कहा जा सकता है कि परमेश्वर के सामने जो कीमत वे अदा कर चुके हैं और जिस पीड़ा से वे गुज़र चुके हैं उसके कारण वे उसकी प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त करते हैं, क्योंकि परमेश्वर किसी का विशेष रूप से सत्कार नहीं करता है। लोगों के प्रति अपने व्यवहार में वह हमेशा निष्पक्ष रहता है, लेकिन वह लोगों को जो प्रदान करता है वह उसे मनमाने ढंग से और बिना किसी शर्त के नहीं देता है। यह उसके धर्मी स्वभाव का एक पहलू है। वास्तविक जीवन में, अधिकांश लोग अभी तक इस क्षेत्र को प्राप्त करने से दूर हैं। कम से कम, उनका दिल अभी भी पूरी तरह से परमेश्वर की ओर नहीं झुका है, और इसलिए उनके जीवन स्वभाव में अभी भी कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हो पाया है। इसका कारण यह है कि वे केवल परमेश्वर की कृपा के बीच रहते हैं, लेकिन वे अभी भी पवित्र आत्मा के कार्य को हासिल नहीं कर पाए हैं। लोगों का उपयोग करने के लिए परमेश्वर इन मानदंडों का इस्तेमाल करता है: उनका दिल परमेश्वर की ओर झुका होता है, परमेश्वर के वचनों का उनपर बोझ पड़ता है, उनके पास तड़पता हुआ दिल और सत्य को तलाशने का संकल्प होता है। केवल ऐसे लोग ही पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सकते हैं और अक्सर प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त कर पाते हैं।

— “वचन देह में प्रकट होता है” में “परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है” से उद्धृत

लोगों के भीतर पवित्र आत्मा के काम की यह एक शर्त है। जब तक उनमें प्यास है और वे खोज करते हैं और परमेश्वर के कार्यकलापों के बारे में आधे-अधूरे मन वाले या संशययुक्त नहीं हैं, और वे हर समय अपने कर्तव्य को बनाए रखने में समर्थ हैं, केवल इसी तरह से वे पवित्र आत्मा का काम प्राप्त कर सकते हैं। परमेश्वर के काम के प्रत्येक कदम में, मानव जाति से जो अपेक्षित है वह है आसाधारण आत्मविश्वास है और परमेश्वर के सामने माँग करना—केवल अनुभव के माध्यम से ही लोग यह पता कर पाते हैं कि परमेश्वर कितना प्यारा है और पवित्र आत्मा लोगों में कैसे काम करता है। यदि तुम अनुभव नहीं करते हो, यदि तुम उस माध्यम से अपना रास्ता नहीं महसूस करते हो, यदि तुम तलाश नहीं करते हो, तो तुम्हें कुछ प्राप्त नहीं होगा। तुम्हें अपने अनुभवों के माध्यम से अपना रास्ता महसूस करना चाहिए, और केवल अपने अनुभवों के माध्यम से ही तुम परमेश्वर के कार्यों को देख सकते हो, और उसकी चमत्कारिकता और अगाधता को पहचान सकते हो।

— “वचन देह में प्रकट होता है” में “तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति अवश्य बनाए रखनी चाहिए” से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा लोगों को सिद्ध किए जाने के लिए एक नियम है, जो यह है कि वह तुम्हारे योग्य भाग का प्रयोग करके तुम्हें प्रबुद्ध करता है, जिससे तुम्हारे पास अभ्यास करने के लिए एक मार्ग हो और जो तुम्हें समस्त नकारात्मक अवस्थाओं से अलग कर सकता है, तुम्हारी आत्मा को स्वतन्त्रता प्राप्त करने में सहायता करता है, और तुम्हें उससे प्रेम करने के और योग्य बनाता है। इस रीति से तुम शैतान के भ्रष्ट स्वभाव को उतार फेंकने के योग्य हो जाते हो। तुम सरल और उदार, स्वयं को जानने और सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक हो। परमेश्वर देखता है कि तुम स्वयं जानने और सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक हो, अतः जब तुम दुर्बल और नकारात्मक होते हो, वह दोहरे रूप से तुम्हें प्रबुद्ध करता है, स्वयं को और अधिक जानने में तुम्हारी सहायता करता है, स्वयं के लिए पश्चाताप के और अधिक इच्छुक होने, और उन बातों का अभ्यास करने के योग्य करता है, जिन बातों का अभ्यास तुम्हें करना चाहिए। मात्र इसी रीति से तुम्हारा हृदय शांतिपूर्ण और आराम में होता है। एक व्यक्ति, जो साधारणतः परमेश्वर और स्वयं को जानने और अपने अभ्यास करने पर ध्यान देता है, वही परमेश्वर के कार्य को निरन्तर प्राप्त करने और परमेश्वर से निरन्तर मार्गदर्शन और प्रबुद्धता प्राप्त करने के योग्य होगा। एक नकारात्मक अवस्था में होने पर भी, वह अपने विवेक के कार्य से या परमेश्वर के वचन की प्रबुद्धता से तुरन्त कायापलट करने के योग्य होता है।

— “वचन देह में प्रकट होता है” में “मात्र वे लोग जो अभ्यास करने पर केन्द्रित रहते हैं, उन्हें ही सिद्ध बनाया जा सकता है” से उद्धृत

परमेश्वर उसमें कार्य करता है जो परमेश्वर के वचनों को संजोए रहते और उसका अनुसरण करते हैं। जितना तू परमेश्वर के वचनों को संजोता है, उतना ही उसका आत्मा तुझमें कार्य करता है। कोई व्यक्ति परमेश्वर के वचन को जितना ज्यादा संजोता है, उसका परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने का मौका उतना ही ज्यादा होता है। परमेश्वर उसे पूर्ण बनाता है, जो वास्तव में उससे प्यार करता है। वह उसको पूर्ण बनाता है, जिसका हृदय उसके सम्मुख शांत रहता है। यदि तू परमेश्वर के सभी कार्य को संजोए रखता है, यदि तू उसकी प्रबुद्धता को संजोए रखता है, यदि तू परमेश्वर की उपस्थिति को संजोए रखता है, यदि तू परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा को संजोए रखता है, यदि तू इस बात को संजोए रखता है, कि कैसे परमेश्वर के वचन तेरे जीवन की वास्तविकता और तेरा प्रावधान बन जाते हैं, तो तू परमेश्वर के दिल के सबसे करीब है। यदि तू परमेश्वर के कार्य को संजोता है, यदि तेरे वे सारे कार्य जो उसने तेरे लिए किया है, उसे संजोए रखता है, तो वह तुझे आशीष देगा और जिसके कारण जो कुछ तेरा है वह बढ़ेगा।

— “वचन देह में प्रकट होता है” में “परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके हृदय के अनुसार चलते हैं” से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

पवित्र आत्मा मसीह के वचनों के अनुसार कार्य करता है, और वह लोगों की मसीह के प्रति स्वीकृति और उनके समर्पण के अनुसार भी काम करता है। केवल अगर लोग मसीह को स्वीकार करते हैं और मसीह को समर्पित होते हैं, तभी वे पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हैं। यदि लोग मसीह के विरुद्ध चलते हैं या उसके खिलाफ़ विद्रोह करते हैं, तो उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होगा। किसी व्यक्ति का परमेश्वर में विश्वास उसे उद्धार देगा या नहीं, इसका निर्णय इस बात से होता है कि वह मसीह को सचमुच स्वीकार कर उसके प्रति समर्पित हो सकता है या नहीं। पवित्र आत्मा का कार्य पूरी तरह से मसीह के प्रति किसी व्यक्ति की स्वीकृति और समर्पण पर आधारित होता है। अनुग्रह के युग में, पवित्र आत्मा का कार्य लोगों द्वारा प्रभु यीशु को स्वीकार करने, उसके प्रति समर्पित होने और उसकी आराधना करने के अनुसार पूरा किया गया था। राज्य के युग में, पवित्र आत्मा का कार्य लोगों द्वारा सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार करने, उसके प्रति समर्पित होने और उसकी आराधना करने के अनुसार किया जाता है। पवित्र आत्मा सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के मुताबिक भी कार्य करता है, ताकि विश्वासियों को परमेश्वर के वचनों में लाया जा सके और उन्हें उद्धार और पूर्णता तक पहुँचाया जा सके। यही पवित्र आत्मा के कार्य का आधार और सिद्धांत है। कई धार्मिक अगुवाओं ने मसीह का विरोध या निंदा करने की सज़ा के रूप में मृत्यु पाई है। बहुत से धार्मिक लोगों ने अंत के दिनों के मसीह को अस्वीकार करने की वजह से, अंधेरों में गिरकर पवित्र आत्मा के कार्य को खो दिया है। परमेश्वर के घर में, मसीह के बारे में अपनी दुराग्रही धारणाओं के कारण बहुत से लोगों के जीवन मुरझा गए हैं और उन्होंने हार मान ली है, और कई अन्य लोगों को पवित्र आत्मा के कार्य से इसलिए बाहर रखा गया है कि वे केवल परमेश्वर के आत्मा में विश्वास करते हैं, मसीह में नहीं। ये सभी बातें लोगों द्वारा मसीह को अस्वीकार करने या उसके प्रति समर्पण न करने के कारण होती हैं। किसी विश्वासी के पास पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं, यह पूरी तरह से मसीह के प्रति उसके दृष्टिकोण से तय होता है। यदि कोई व्यक्ति केवल स्वर्ग के परमेश्वर में विश्वास करता है, और मसीह के प्रति समर्पित नहीं होता है, तो वह पवित्र आत्मा के कार्य को कभी भी प्राप्त नहीं करेगा। अभी भी विभिन्न कलीसियाओं में कई लोग ऐसे हैं जो केवल परमेश्वर के आत्मा में विश्वास करते हैं, लेकिन मसीह में विश्वास नहीं करते हैं, और इस तरह वे पवित्र आत्मा का कार्य खो देते हैं। कई लोग ऐसे हैं जो केवल मसीह के वचनों में विश्वास करते हैं, लेकिन मसीह के प्रति समर्पित नहीं होते हैं, और इसलिए वे परमेश्वर की नाराज़गी के पात्र होते हैं। इसलिए, मसीह को स्वीकार करना और मसीह के प्रति समर्पित होना पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने की कुंजी है। केवल जब कोई मसीह को स्वीकार करेगा और मसीह के प्रति समर्पित होगा, तभी वह उद्धार प्राप्त करेगा और पूर्ण किया जाएगा। स्पष्ट है कि प्रत्येक युग में पवित्र आत्मा के प्रत्येक कार्य का अपना एक आधार और सिद्धांत होता है। कौन जानता है कि कितने लोग अभी भी मसीह के प्रति समर्पित होने के महत्व को नहीं समझते हैं। पवित्र आत्मा पूरी तरह से मसीह के वचनों के अनुसार कार्य करता है। अगर लोग मसीह के वचनों को स्वीकार नहीं कर सकते, और उनके बारे में धारणाएँ बनाए रखते हैं और उनका विरोध करते हैं, तो वे पवित्र आत्मा का कार्य बिलकुल ही प्राप्त नहीं कर सकते। बहुत से लोग केवल सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम से प्रार्थना करते हैं, लेकिन मसीह के कार्य के प्रति समर्पित नहीं होते हैं, और पूरी तरह से मसीह के वचनों को स्वीकार नहीं करते हैं। इस तरह के लोग मसीह-विरोधी हैं, और वे पवित्र आत्मा का कार्य बिल्कुल ही प्राप्त नहीं कर सकते हैं।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

पवित्र आत्मा का कार्य मुख्य रूप से लोगों को परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने में और सत्य को समझने में मार्गदर्शन देना है। परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने में कौन से पहलू शामिल हैं? परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने का अर्थ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति परमेश्वर के एक वाक्य विशेष को पढ़ता है, इस पर थोड़ा-सा चिंतन करता है और फिर उसे कुछ समझ हो जाती है। यह परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने के समकक्ष नहीं है। यह एक पूरी तरह से अलग बात है। अनुभव के माध्यम से परमेश्वर के वचन में प्रवेश करना सबसे महत्वपूर्ण बात है। इस “अनुभव” में अनुभवों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है। यह मनुष्य के अनुभव का सिर्फ एक पहलू नहीं है। इस अनुभव के कई पहलू हैं। अपने कर्तव्य को पूरा करना भी परमेश्वर के वचन का अनुभव करना है। सत्य को अभ्यास में लाना भी परमेश्वर के वचन का अनुभव करना है। विशेष रूप से, विभिन्न प्रकार के परीक्षणों और शुद्धिकरण से गुज़रना परमेश्वर के वचन का और भी अधिक अनुभव करना है। चाहे संदर्भ या परिस्थिति कोई भी हो, जब तक तुम परमेश्वर के वचन का अनुभव करते हो, तब तक तुम पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने में सक्षम होगे। उदाहरण के लिए, जब हम परीक्षणों का सामना करते हैं, तो हम परमेश्वर के इरादों की खोज करने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं। परिणामस्वरूप, पवित्र आत्मा हमें प्रबुद्ध करता है ताकि हम परमेश्वर के इरादों को समझ सकें। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने से संबंधित है। …इसके अतिरिक्त, हमारे कर्तव्यों को पूरा करने की प्रक्रिया में, और हमारे रोजमर्रा के जीवन के अनुभवों के भीतर, परिस्थिति चाहे कैसी भी हो, जब तक हम सत्य की तलाश करते हैं, जब तक हम परमेश्वर के इरादों की खोज करते हैं और परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, तब तक हम पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने में सक्षम होंगे। इसका कारण यह है परमेश्वर के वचन और सत्य में प्रवेश करने में हमारा मार्गदर्शन करने के लिए यहाँ पवित्र आत्मा है। जब इस पहलू की बात आती है, तो ऐसे कुछ लोग हैं जिनके पास बहुत अनुभव है। चाहे वे किसी भी परिस्थिति का सामना करें, वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं। चाहे वे किसी भी तरह के लोगों से मिलें, वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं और परमेश्वर से उनको प्रबुद्ध करने और उन्हें बुद्धि और समझ देने के लिए आग्रह करते हैं। वे परमेश्वर से उनका मार्गदर्शन करने के लिए कहते हैं। जब तक लोग इस तरह से परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हैं, तब तक वे परमेश्वर के बहुत सारे वचनों को समझेंगे। वे जान लेंगे कि एक ठोस, विशेष परिस्थिति में उन्हें कैसे अभ्यास करना चाहिए। उन्हें पता चल जाएगा कि इसे कैसे अच्छे उपयोग में लाया जाए। यही परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने का तरीका है।

— जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति से उद्धृत

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क्या आकाश की ओर देखकर तुम वाकई प्रभु का स्वागत कर सकते हो?

बहुत-से विश्वासी प्रभु यीशु के बादल पर सवार होकर नीचे उतरने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, ताकि वे विपत्तियाँ आने से पहले परमेश्वर के राज्य में ले जाए जा सकें। लेकिन इस दौरान, वे विपत्तियों को तो बढ़ते देख रहे हैं, मगर प्रभु यीशु अब भी बादल पर सवार होकर नहीं आया। बहुत-से लोगों की आस्था डगमगाने लगी है। कुछ लोग कहते हैं, प्रभु अपनी मर्ज़ी से आयेगा, हमें बस प्रतीक्षा करनी चाहिए। दूसरे कहते हैं, अगर वह विपत्तियों के आने से पहले नहीं आया, तो हो सकता है वह विपत्तियों के दौरान या उनके बाद आये। इन बयानों से क्या पता चलता है? क्या ये नहीं दिखाते कि उनकी आस्था बिल्कुल सतही है? उन्होंने आस्था गँवा दी है, वे न इसे खोज रहे हैं और न ही इस पर गौर कर रहे हैं, बल्कि सिर्फ विपत्तियों के आने का इंतज़ार कर रहे हैं। उन्हें नहीं पता कि और क्या करें। वे वर्षों से आकाश की ओर टकटकी लगाये देख रहे हैं, मगर अभी तक प्रभु का स्वागत नहीं कर पाये। क्या वाकई यही तरीका सही है? प्रभु का स्वागत करने के लिए सबसे अहम क्या है? मुझे याद है प्रभु यीशु ने कहा : “मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं” (यूहन्ना 10:27)। “देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ” (प्रकाशितवाक्य 3:20)। प्रकाशित वाक्य में भी कई जगहों पर यह भविष्यवाणी की गयी है : “जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है” (प्रकाशितवाक्य अध्याय 2, 3)। ये पद दिखाते हैं कि प्रभु के आने का स्वागत करने की कुंजी है आत्मा द्वारा कलीसियाओं से कही गयी बातों को खोजना, और परमेश्वर की वाणी को सुनना। जो लोग परमेश्वर की वाणी को सुनते हैं, वे प्रभु का स्वागत करते हैं, वे ही बुद्धिमान कुँवारियाँ हैं। मैं इस सत्य को पहले नहीं समझ पाया था, मगर अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के भरोसे रहा, बस आकाश की ओर टकटकी लगाये देखता रहा। जब मैंने किसी व्यक्ति को गवाही देते सुना कि प्रभु यीशु पहले ही वापस आ चुका है और कई सत्य व्यक्त कर रहा है, तो मैंने न तो उसे खोजा, न ही उसकी जांच-पड़ताल की, मैंने प्रभु का स्वागत करने और स्वर्गारोहण का अपना मौक़ा लगभग गँवा दिया।

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Hindi Christian Film अंश 3 : “मायाजाल को तोड़ दो” – क्या बाइबल के अतिरिक्त परमेश्वर के शब्दों का कोई अस्तित्व है?

Hindi Christian Film अंश 3 : “मायाजाल को तोड़ दो” – क्या बाइबल के अतिरिक्त परमेश्वर के शब्दों का कोई अस्तित्व है?

कुछ धार्मिक लोग मानते हैं कि परमेश्वर के सभी वचन और कार्य बाइबल में हैं, और बाइबल के अलावा परमेश्वर का कोई भी वचन और कार्य नहीं है। क्या इस तरह का विचार सत्य के अनुसार है? बाइबल कहती है, “और भी बहुत से काम हैं, जो यीशु ने किए; यदि वे एक एक करके लिखे जाते, तो मैं समझता हूँ कि पुस्तकें जो लिखी जातीं वे संसार में भी न समातीं।” (यूहन्ना 21: 25) (© BSI) सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: “परमेश्वर जो है और उसके पास जो है, वह सदैव अक्षय और असीम है।…… पुस्तकों, वचनों या उनकी अतीत की उक्तियों में परमेश्वर को सीमांकित न करो। परमेश्वर के कार्य की विशेषता के लिए केवल एक ही शब्द है—नवीन। वह पुराने रास्ते लेना या अपने कार्य को दोहराना पसंद नहीं करता, और इसके अलावा, वह नहीं चाहता कि लोग उसे एक निश्चित दायरे के भीतर सीमांकित करके उसकी आराधना करें। यह परमेश्वर का स्वभाव है।” पढना जारी रखे

Hindi Christian Movie|अंश 4 : “बेड़ियों को तोड़ो और भागो” – धार्मिक फरीसियों के बंधन से मुक्ति पाओ और परमेश्वर की ओर लौट आओ

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मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है (I)

1. मत्ती 12:1 उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से होकर जा रहा था, और उसके चेलों को भूख लगी तो वे बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।

2. मत्ती 12:6-8 पर मैं तुम से कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इसका अर्थ जानते, “मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं,” तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है।

आओ पहले हम इस अंश को देखें: “उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से होकर जा रहा था, और उसके चेलों को भूख लगी तो वे बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।”

हमने इस अंश को क्यो चुना है? इसका परमेश्वर के स्वभाव से क्या सम्बन्ध है? इस पाठ में, पहली चीज़ जो हम जानते हैं वह है कि यह सब्त का दिन था, परन्तु प्रभु यीशु बाहर गया और अपने चेलों को अनाज के खेतों में ले गया। इससे ज्यादा “विश्वासघाती” क्या हो सकती है कि वे मकई की “बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।” व्यवस्था के युग में, यहोवा परमेश्वर की व्यवस्था थी कि लोग सब्त के दिन यूँ ही बाहर नहीं जा सकते थे और गतिविधियों में भाग नहीं ले सकते थे—बहुत सी ऐसी बातें थीं जिन्हें सब्त के दिन नहीं किया जा सकता था। प्रभु यीशु की ओर से किया गया यह कार्य उनके लिए पेचीदा था जो एक लम्बे समय से व्यवस्था के अधीन जीवन बिता रहे थे, और इसने आलोचना को भी भड़काया था। जहाँ तक उनके भ्रम और इस बात का संबंध है कि यीशु ने जो किया उसके बारे में उन्होंने किस प्रकार बात की, हम फिलहाल उसे एक ओर रखेंगे और पहले यह चर्चा करेंगे कि प्रभु यीशु ने, सभी दिनों में से, सब्त के दिन ही ऐसा करना क्यों चुना, और इस कार्य के द्वारा वह उन लोगों से क्या कहना चाहता था जो व्यवस्था के अधीन रह रहे थे। यह इस अंश और परमेश्वर के स्वभाव के बीच का संबंध है जिसके बारे में मैं तुमसे बात करना चाहता हूँ।

जब प्रभु यीशु मसीह आया, तो उसने लोगों से संवाद करने के लिए अपने व्यावहारिक कार्यों का उपयोग कियाः परमेश्वर ने व्यवस्था के युग को अलविदा किया था और नए कार्य का प्रारम्भ किया था, और इस नए कार्य को सब्त का पालन करने की आवश्यकता नहीं थी; जब परमेश्वर सब्त के दिन की सीमाओं से बाहर आ गया, तो यह उसके नए कार्य का बस एक पूर्वानुभव था; वास्तविक और महान कार्य अभी आना था। जब प्रभु यीशु ने अपना कार्य प्रारम्भ किया, तो उसने पहले से ही व्यवस्था की जंज़ीरों को पीछे छोड़ दिया था, और उस युग के विधि-विधानों और सिद्धांतों को तोड़ दिया था। उसमें, व्यवस्था से जुड़ी किसी भी बात का निशान नहीं था; उसने उसे पूर्णत: उतार कर फेंक दिया था तथा उसका अब और अनुसरण नहीं करता था, और उसने मनुष्यजाति से उसका अब और अनुसरण करने की अपेक्षा नहीं की थी। इसलिए तुम यहाँ देखते हो कि प्रभु यीशु सब्त के दिन मकई के खेतों से होकर गुज़रा, प्रभु ने आराम नहीं किया, बल्कि बाहर काम करता रहा। उसका यह कार्य लोगों की धारणाओं के लिए एक आघात था और इसने उन्हें सूचित किया कि वह व्यवस्था के अधीन अब और जीवन नहीं बिताएगा, और यह कि उसने सब्त की सीमाओं को छोड़ दिया है और एक नई कार्यशैली के साथ वह मनुष्यजाति के सामने और उनके बीच एक नई छवि में प्रकट हुआ है। उसके इस कार्य ने लोगों को बताया कि वह अपने साथ एक नया कार्य लाया है जो व्यवस्था से बाहर जाने और सब्त से बाहर जाने से आरम्भ हुआ था। जब परमेश्वर ने अपना नया कार्य कार्यान्वित किया, तो वह अतीत से अब और नहीं चिपका रहा, और वह व्यवस्था के युग की विधियों के बारे में अब और चिन्तित नहीं था। न ही वह पूर्ववर्ती युग के अपने कार्य से प्रभावित था, बल्कि उसने सब्त के दिन में भी सामान्य रूप से कार्य किया और जब उसके चेले भूखे थे, तो वे मकई की बालें तोड़कर खा सकते थे। यह सब कुछ परमेश्वर की निगाहों में बिल्कुल सामान्य था। परमेश्वर के पास अधिकांश कार्य करने के लिए जिसे वह करना चाहता है और अधिकांश बातें कहने के लिए जिन्‍हें वह कहना चाहता है, एक नई शुरूआत हो सकती है। एक बार जब उसने एक नई शुरूआत कर दी, तो वह न तो फिर से अपने पिछले कार्य का उल्लेख करता है और न ही उसे जारी रखता है। क्योंकि परमेश्वर के पास उसके कार्य के स्वयं के सिद्धांत हैं। जब वह नया कार्य शुरू करना चाहता है, तो यह तब होता है जब वह मनुष्यजाति को अपने कार्य के एक नए स्तर में पहुँचाना चाहता है, और जब उसका कार्य एक उच्चतर चरण में प्रवेश कर लेता है। यदि लोग लगातार पुरानी कहावतों या विधि-विधानों के अनुसार काम करते रहेंगे या उन्हें निरन्तर मज़बूती से पकड़ें रहेंगे, तो इसे याद नहीं रखेगा या इसकी प्रशंसा नहीं करेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह पहले से ही एक नए कार्य को ला चुका है, और अपने कार्य में एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है। जब वह एक नए कार्य को आरम्भ करता है, तो वह मनुष्यजाति के सामने पूर्णतः नई छवि में, पूर्णतः नए कोण से, और पूर्णतः नए तरीके से प्रकट होता है ताकि लोग उसके स्वभाव के भिन्न-भिन्न पहलुओं को और उसके स्वरूप को देख सकें। यह उसके नए कार्य में उसके लक्ष्यों में से एक है। परमेश्वर पुराने को थामे नहीं रहता है या घिसे-पिटे मार्ग को नहीं लेता है; जब वह कार्य करता और बोलता है तो यह उतना निषेधात्मक नहीं होता है जितना लोग कल्पना करते हैं। परमेश्वर में, सभी स्वतंत्र और मुक्त हैं, और कोई निषेधात्मकता नहीं है, कोई लाचारी नहीं है—जो वह मनुष्यजाति के लिए लाता है वह सम्पूर्ण आज़ादी और मुक्ति है। वह एक जीवित परमेश्वर है, एक ऐसा परमेश्वर जो असलियत में, और सचमुच में अस्तित्व में है। वह कोई कठपुतली या मिट्टी की मूर्ति नहीं है, और वह उन मूर्तियों से बिल्कुल भिन्न है जिन्हें लोग प्रतिष्ठापित करते हैं और जिनकी आराधना करते हैं। वह जीवित और जीवन्त है और उसके कार्य और वचन मनुष्यों के लिए जो लेकर आते हैं वे हैं सम्पूर्ण जीवन और ज्योति, सम्पूर्ण स्वतन्त्रता और मुक्ति, क्योंकि वह सत्य, जीवन, और मार्ग को धारण करता है—और वह अपने किसी भी कार्य में किसी भी चीज़ के द्वारा विवश नहीं होता है। लोग चाहे कुछ भी क्यों न कहें और चाहे वे उसके नए कार्य को किसी भी प्रकार से क्यों न देखें या कैसे भी उसका आकलन क्‍यों न करें, वह बिना किसी आशंका के अपने कार्य को पूरा करेगा। वह किसी की भी धारणाओं या उसके कार्य और वचनों पर उठी अँगुलियों के बारे में, या अपने नए कार्य के लिए उनके कठोर विरोध और प्रतिरोध की भी चिन्ता नहीं करेगा। जो परमेश्वर करता है उसे मापने या परिभाषित करने, उसके कार्य को बदनाम करने, या तितर-बितर करने या उसमें तोड़फोड़ करने के लिए, संपूर्ण सृष्टि में कोई भी मानवीय तर्क, या मानवीय कल्पनाओं, ज्ञान, या नैतिकता का उपयोग नहीं कर सकता है। उसके कार्य में और जो वह करता है उसमें कोई निषेधात्मकता नहीं है, और उसे किसी मनुष्य, चीज़ या पदार्थ के द्वारा लाचार नहीं किया जाएगा, और उसे किसी शत्रुतापूर्ण ताक़तों के द्वारा तितर-बितर नहीं किया जाएगा। जहाँ तक उसके नए कार्य का संबंध है, वह एक सर्वदा विजयी राजा है, और किन्हीं भी शत्रुतापूर्ण ताक़तों और मनुष्यजाति में से सभी विधर्मों और भ्रांतियों को उसकी चरण-पीठ के नीचे कुचल दिया जाता है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह अपने कार्य के किस नए स्तर पर काम कर रहा है, इस निश्चित रूप से मनुष्यजाति के बीच विकसित और विस्तारित किया जाएगा, इसे निश्चित रूप से संपूर्ण विश्व में तब तक अबाधित रूप से कार्यान्वित किया जाएगा जब तक कि उसका महान कार्य पूर्ण नहीं हो जाता है। यह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि, और उसका अधिकार और उसकी सामर्थ्य है। इस प्रकार, प्रभु यीशु मसीह खुलकर बाहर जा सकता था और सब्त के दिन कार्य कर सकता था क्योंकि उसके हृदय में कोई नियम नहीं थे, और वहाँ मनुष्यजाति से उत्पन्न कोई ज्ञान और सिद्धांत नहीं था। उसके पास जो था वह परमेश्वर का नया कार्य और उसका मार्ग था, और उसका कार्य मनुष्यजाति को स्वतन्त्र करना था, उसे मुक्त करना था, उन्हें प्रकाश में बने रहने की अनुमति देना था, और उन्हें जीने की अनुमति देना था। और जो मूर्तियों या झूठे ईश्वरों की पूजा करते हैं वे, सभी प्रकार के नियमों और वर्जनाओं से नियंत्रित, हर दिन शैतान के बन्धनों में जीते हैं—आज एक चीज़ का निषेध होता है, कल किसी दूसरी चीज़ का निषेध होता है—उनके जीवन में कोई स्वतन्त्रता नहीं है। वे जंज़ीरों में जकड़े हुए कैदियों के समान हैं जिनके पास कोई खुशी नहीं है जिसके बारे में वे बात करें। “निषेध” क्या दर्शाता है? यह विवशता, बन्धनों, और दुष्टता को दर्शाता है। जैसे ही कोई व्यक्ति किसी मूर्ति की आराधना करता है तो वह एक झूठे ईश्वर की आराधना कर रहा होता है, वह एक दुष्ट आत्मा की आराधना कर रहा होता है। प्रतिबन्ध इसके साथ आता है। तुम यह या वह नहीं खा सकते हो, तुम आज बाहर नहीं जा सकते हो, तुम कल अपना चूल्हा नहीं जला सकते हो, तुम अगले दिन नए घर में नहीं जा सकते हो, विवाह तथा अन्तिम क्रिया के लिए, और यहाँ तक कि बच्चे को जन्म देने के लिए भी कुछ निश्चित दिनों को ही चुनना होगा। यह क्या कहलाता है? यही प्रतिबन्ध कहलाता है; यह मनुष्यजाति का बंधन है, और ये शैतान की जंज़ीरें हैं और दुष्ट आत्माएँ इन्हें नियन्त्रित कर रही हैं, और उनके हृदयों और शरीरों को अवरुद्ध कर रही हैं। क्या ये प्रतिबन्ध परमेश्वर के साथ विद्यमान रहते हैं? जब परमेश्वर की पवित्रता की बात करते हैं, तो तुम्हें सबसे पहले यह सोचना चाहिएः कि परमेश्वर के साथ कोई भी निषेध नहीं है। परमेश्वर के वचनों और कार्य में उसके सिद्धांत हैं, किन्तु कोई निषेध नहीं हैं, क्योंकि परमेश्वर स्वयं सत्य, मार्ग, और जीवन है।

आओ हम निम्नलिखित अंश को देखें: “पर मैं तुम से कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इसका अर्थ जानते, ‘मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं,’ तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है” (मत्ती 12:6-8)। यहाँ “मन्दिर” किस का इशारा करता है? आसान शब्दों में कहें तो, “मन्दिर” एक शोभायमान, ऊँची इमारत का इशारा करता है, और व्यवस्था के युग में, मन्दिर परमेश्वर की आराधना हेतु याजकों के लिए एक स्थान था। जब प्रभु यीशु ने कहा, “कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है,” यहाँ “वह” किसकी ओर इशारा करता है? स्पष्ट रूप से “वह” प्रभु यीशु है जो देह में है, क्योंकि केवल वही मन्दिर से बड़ा था। उन वचनों ने लोगों से क्या कहा? उन्होंने लोगों को मन्दिर से बाहर आने के लिए कहा—परमेश्वर पहले ही बाहर आ चुका था और उसमें अब और कार्य नहीं कर रहा था, इसलिए लोगों को मन्दिर के बाहर परमेश्वर के पदचिह्नों को ढूँढ़ना चाहिए और उसके नए कार्य में उसके कदमों का अनुसरण करना चाहिए। प्रभु यीशु मसीह के इस कथन की पृष्ठभूमि यह थी कि व्यवस्था के अधीन, लोग किसी ऐसी चीज़ के रूप में मन्दिर को देखने के लिए आए थे जो स्वयं परमेश्वर से भी बड़ा था। अर्थात्, लोग परमेश्वर की आराधना करने के बजाए मन्दिर की आराधना करते थे, इसलिए प्रभु यीशु मसीह ने उन्हें सावधान किया कि वे मूर्तियों की आराधना न करें, बल्कि परमेश्वर की आराधना करें क्योंकि वह सर्वोच्च है। इसलिए उसने कहाः “मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं।” यह स्पष्ट है कि प्रभु यीशु की नज़रों में, व्यवस्था के अधीन अधिकांश लोग यहोवा की अब और आराधना नही करते थे, बल्कि मात्र बलिदान की प्रक्रिया से होकर जाते थे, और प्रभु यीशु ने निर्धारित किया था कि यह प्रक्रिया मूर्ति पूजा है। इन मूर्ति पूजकों ने मन्दिर को परमेश्वर से अधिक महान और उच्चतर रूप में देखा था। उनके हृदयों में केवल मन्दिर था, न कि परमेश्वर, और यदि वे मन्दिर को खो देते हैं, तो वे अपने निवास स्थान को भी खो देते हैं। मन्दिर के बिना उनके पास आराधना के लिए कोई जगह नहीं थी और वे बलिदानों को कार्यान्वित नहीं कर सकते थे। उनका तथाकथित निवास स्थान वहाँ है जहाँ से वे यहोवा परमेश्वर की आराधना के झण्डे तले संचालन करते थे, जहाँ उन्हें मन्दिर के टिके रहने और अपने स्वयं के क्रियाकलापों को करने की अनुमति दी जाती थी। उनके तथाकथित बलिदानों को चढ़ाना मन्दिर में उनकी सेवा आयोजित करने के बहाने बस उनके स्वयं के व्यक्तिगत शर्मनाक व्यवहारों को कार्यान्वित करने के लिए था। यही वह कारण था कि उस समय लोग मन्दिर को परमेश्वर से भी बड़ा देखते थे। क्योंकि वे मन्दिर को एक आड़ के रूप में, और बलिदानों को लोगों को धोखा देने और परमेश्वर को धोखो देने के लिए एक बहाने के रूप में उपयोग करते थे, इसलिए प्रभु यीशु ने लोगों को चेतावनी देने के लिए ऐसा कहा था। यदि तुम लोग इन वचनों को वर्तमान में लागू करते हो, तब भी वे उतने ही प्रामाणिक और उतने ही उचित हैं। यद्यपि आज लोगों ने व्यवस्था के युग के लोगों के अनुभव की तुलना में अलग परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है, फिर भी उनके स्वभाव का सार एक समान है। आज के कार्य के सन्दर्भ में, लोग अभी भी उसी प्रकार की चीज़ों को करेंगे जैसे कि “मन्दिर परमेश्वर से बड़ा है।” उदाहरण के लिए, लोग अपने कर्तव्यों के निर्वहन को अपनी नौकरी के रूप मे देखते हैं; वे परमेश्वर के लिए गवाही देने और बड़े लाल अजगर से युद्ध करने को, प्रजातंत्र और स्वतन्त्रता के लिए, मानवाधिकारों के बचाव में एक राजनैतिक आन्दोलन के रूप में देखते हैं; वे अपने कर्तव्य को जीवनवृत्तियों के लिए अपने कौशलों का उपयोग करने की ओर मोड़ देते हैं, बल्कि वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने को और कुछ नहीं बल्कि धार्मिक सिद्धांत के पालन के एक अंश के रूप में लेते हैं; इत्यादि। क्या मनुष्यों की ये अभिव्यक्तियाँ आवश्यक रूप से वैसी ही नहीं हैं जैसे कि “मन्दिर परमेश्वर से बढ़कर है”? सिवाय इसके कि दो हज़ार वर्ष पहले, लोग भौतिक मन्दिर में अपने व्यक्तिगत व्यवसाय को कर रहे थे, बल्कि आज, लोग अमूर्त मन्दिरों में अपने व्यक्तिगत व्यवसाय करते हैं। जो लोग नियमों को बहुमूल्य समझते हैं वे नियमों को परमेश्वर से बढ़कर देखते हैं, जो लोग हैसियत से प्रेम करते हैं वे हैसियत को परमेश्वर से बढ़कर मानते हैं, जो लोग अपनी जीवनवृत्ति से प्रेम करते हैं वे जीवनवृत्ति को परमेश्वर से बढ़कर मानते हैं, इत्यादि—उनकी सभी अभिव्यक्तियाँ मुझे यह कहने की ओर ले जाती हैं: “लोग अपने वचनों से परमेश्वर की सबसे बड़े के रूप में स्तुति करते हैं, किन्तु उनकी नज़रों में हर चीज़ परमेश्वर से बढ़कर है।” ऐसा इसलिए है क्योंकि जैसे ही लोगों को परमेश्वर का अनुसरण करने के अपने मार्ग के साथ-साथ अपनी प्रतिभाओं को प्रदर्शित करने, या अपने व्यवसाय या अपनी स्वयं की जीवनवृत्ति के प्रदर्शन का अवसर मिलता है, तो वे अपने आप को परमेश्वर से दूर कर देते हैं और अपने आप को उन जीवनवृत्तियों में झोंक देते हैं जिनसे वे प्रेम करते हैं। जहाँ तक जो कुछ परमेश्वर ने उन्हें सौंपा है उसका, और उसकी इच्छा का संबंध है, उन चीज़ों को बहुत पहले ही फेंक दिया गया है। इस परिदृश्य में, इन लोगों के बारे में और जो लोग दो हज़ार वर्ष पहले मन्दिर में अपना स्वयं का व्यवसाय कर रहे थे उनके बारे में क्या अन्तर है?

— “वचन देह में प्रकट होता है” में “परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III” से उद्धृत

 

आज का बाइबल पाठ—रोज अवश्य-पढ़ें—प्रभु को जानने की ओर आपको लाना  प्रभु यीशु ने सब्त क्यों नहीं रखा? ईसाई अवश्य-पढ़ें

यीशु की कहानी—बाइबल की कथाओं की व्याख्या—व्याख्या: परमेश्वर क्या है

विभिन्न आपदाओं के आने पर आपदाओं से पहले हमारा स्वर्गारोहण कैसे हो सकता है?

क्या आप “आपदाओ से पहले स्वर्गारोहित होने” के सही मतलब को समझते हो?
अब, दुनिया भर में आपदाएं बड़े पैमाने पर बढ़ रही हैं। प्रभु की वापसी के बारे में भविष्यवाणियां मूल रूप से पूरी हो चुकी हैं, फिर हमें हवा में स्वर्गारोहित क्यों नहीं किया गया? इस भ्रम के साथ, मैं नेटवर्क पर उन भाइयों और बहनों से तलाश करता हूं जो प्रभु में विश्वास करते हैं। कुछ भाइयों और बहनों ने मेरे साथ एक लेख साझा किया। इसे पढ़ने के बाद, मुझे “आपदाओं से पहले स्वर्गारोहित होने” का सही अर्थ समझ में आया। भाइयों और बहनों, क्या आप आपदाओं से पहले स्वर्गारोहित होने के लिए तरस रहे है? क्या आप जानते हैं कि आपदाओं से पहले स्वर्गारोहित होने का सही अर्थ क्या है? कृपया लिंक पर क्लिक करें और लेख पढ़ें। जवाब वहीं है! पढना जारी रखे

क्या आपने नहीं सुना? अंत के दिनों में प्रभु की वापसी को लेकर काफ़ी हलचल है

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परमेश्वर कहते हैं, “मैं पूरे ब्रह्मांड में अपना कार्य कर रहा हूँ, और पूरब से असंख्य गर्जनायें गूँज रही हैं, जो सभी राष्ट्रों और संप्रदायों को झकझोर रही हैं। यह मेरी वाणी है जिसने वर्तमान में सभी मनुष्यों की अगुवाई की है। मैं अपनी वाणी से सभी मनुष्यों को जीत लूंगा, उन्हें इस धारा में बहाऊंगा और अपने सामने समर्पण करवाऊंगा, क्योंकि मैंने बहुत पहले पूरी पृथ्वी से अपनी महिमा को वापस लेकर इसे नये सिरे से पूरब में जारी किया है। भला कौन मेरी महिमा को देखने के लिए लालायित नहीं है? कौन बेसब्री से मेरे लौटने का इंतज़ार नहीं कर रहा है? किसे मेरे पुनः प्रकटन की प्यास नहीं है? कौन मेरी सुंदरता को देखने के लिए तरस नहीं रहा है? कौन प्रकाश में नहीं आना चाहता? कौन कनान की समृद्धि को नहीं देखना चाहता? किसे उद्धारकर्ता के लौटने की लालसा नहीं है? कौन महान सर्वशक्तिमान परमेश्वर की आराधना नहीं करता है? मेरी वाणी पूरी पृथ्वी पर फ़ैल जाएगी; अपने चुने हुए लोगों के समक्ष, मैं चाहता हूँ कि मैं उनसे अधिक वचन बोलूँ। मैं पूरे ब्रह्मांड के लिए और पूरी मानवजाति के लिए अपने वचन बोलता हूँ, उन शक्तिशाली गर्जनाओं की तरह जो पर्वतों और नदियों को हिला देते हैं। इस प्रकार मेरे मुँह से निकले वचन मनुष्य के लिए खज़ाना बन जाते हैं, और सभी मनुष्य मेरे वचनों का आनंद लेते हैं। बिजली पूरब से चमकते हुए सीधे पश्चिम की ओर जाती है। मेरे वचन ऐसे हैं कि मनुष्य उन्हें छोड़ नहीं पाता है और साथ ही उसकी थाह भी नहीं ले सकता है, लेकिन उनका अधिक से अधिक आनंद उठाता है। एक नवजात शिशु की तरह, सभी मनुष्य खुश और आनंद से भरे हैं और मेरे आने की खुशी मना रहे हैं। अपने वचनों के माध्यम से, मैं सभी मनुष्यों को अपने समक्ष लाऊंगा। उसके बाद, मैं औपचारिक तौर पर मनुष्य जाति में प्रवेश करूंगा ताकि वे मेरी आराधना कर सकें। मुझसे निकलने वाली महिमा और मेरे मुँह से निकले वचनों से, मैं ऐसा इंतजाम करूंगा कि सभी मनुष्य मेरे समक्ष आएंगे और देखेंगे कि बिजली पूरब से चमक रही है और मैं भी पूरब में ‘जैतून के पर्वत’ पर उतर चुका हूँ। वे यह देखेंगे कि मैं बहुत पहले से पृथ्वी पर मौजूद हूँ, यहूदियों के पुत्र के रूप में नहीं, बल्कि पूरब की बिजली के रूप में। क्योंकि बहुत पहले मेरा पुनरुत्थान हो चुका है, और मैं लोगों के बीच से जा चुका हूँ, और फिर महिमा के साथ लोगों के बीच प्रकट हुआ हूँ। मैं वही हूँ जिसकी आराधना अनगिनत साल पहले की गई थी, और मैं वह शिशु हूँ जिसे अनगिनत साल पहले इज़राइलियों ने त्याग दिया था। इसके अलावा, मैं वर्तमान युग का संपूर्ण-महिमामय सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ! सब लोग मेरे सिंहासन के सामने आएं और मेरे भव्य मुखमंडल को देखें, मेरी वाणी सुनें और मेरे कर्मों को देखें। यही मेरी संपूर्ण इच्छा है; यही मेरी योजना का अंतिम पल और उसका चरम बिंदु है, यही मेरे प्रबंधन का उद्देश्य है। सभी राष्ट्र मेरी आराधना करें, हर ज़बान मुझे स्वीकार करें, हर इंसान मुझमें अपनी आस्था दिखाए और हर इंसान मुझ पर भरोसा करे!” (“सात गर्जनाएँ—भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे”)।

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बाइबल के विषय में (1)

परमेश्वर में विश्वास करते हुए बाइबल के समीप कैसे जाना चाहिए? यह एक सैद्धांतिक प्रश्न है। हम इस प्रश्न पर संवाद क्यों कर रहे हैं? क्योंकि तुम भविष्य में सुसमाचार को फैलाओगे और राज्य के युग के कार्य का विस्तार करोगे, और इसलिए आज मात्र परमेश्वर के कार्य के बारे में बात करने के योग्य होना ही काफी नहीं है। उसके कार्य का विस्तार करने के लिए, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि तुम लोगों की पुरानी धार्मिक अवधारणाओं और विश्वास के पुराने माध्यमों का समाधान करने के योग्य बनो, और उन्हें पूरी तरह आश्वस्त करके ही छोड़ो—और उस स्थिति तक आने में बाइबल शामिल है। बहुत सालों से, लोगों के विश्वास का परम्परागत माध्यम (दुनिया के तीन मुख्य धर्मों में से एक, मसीहियत के विषय में) बाइबल पढ़ना ही रहा है; बाइबल से दूर जाना प्रभु में विश्वास नहीं है, बाइबल से दूर जाना एक पाषंड और विधर्म है, और यहाँ तक कि जब लोग अन्य पुस्तकों को पढ़ते हैं, तो इन पुस्तकों की बुनियाद, बाइबल की व्याख्या ही होनी चाहिए। कहने का अर्थ है कि, यदि तुम प्रभु में विश्वास करते हो, तो तुम्हें बाइबल अवश्य पढ़नी चाहिए, बाइबल के अलावा तुम्हें किसी अन्य पुस्तक की आराधना नहीं करनी चाहिए जिस में बाइबल शामिल नहीं हो। यदि तुम करते हो, तो तुम परमेश्वर के साथ विश्वासघात कर रहे हो। उस समय से जब बाइबल थी, प्रभु के प्रति लोगों का विश्वास, बाइबल के प्रति विश्वास रहा है। यह कहने के बजाए कि लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, यह कहना बेहतर है कि वे बाइबल में विश्वास करते हैं; यह कहने की अपेक्षा की उन्होंने बाइबल पढ़नी आरम्भ कर दी है, यह कहना बेहतर है कि उन्होंने बाइबल पर विश्वास करना आरम्भ कर दिया है; और यह कहने की अपेक्षा कि वे प्रभु के सामने वापस आ गए हैं, यह कहना बेहतर होगा कि वे बाइबल के सामने वापस आ गए हैं। इस तरह से, लोग बाइबल की आराधना ऐसे करते हैं मानो कि यह परमेश्वर है, मानो कि यह उनका जीवन रक्त है और इसे खोना अपने जीवन को खोने के समान होगा। लोग बाइबल को परमेश्वर के समान ही ऊँचा देखते हैं, और यहाँ तक कुछ ऐसे भी हैं जो इसे परमेश्वर से भी ऊँचा देखते हैं। यदि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के बिना हैं, यदि वे परमेश्वर का एहसास नहीं कर सकते हैं, तो वे जीवन जीते रह सकते हैं—परंतु जैसे ही वे बाइबल को खो देते हैं, या बाइबल के प्रसिद्ध अध्यायों और कथनों को खो देते हैं, तो यह ऐसा है मानो उन्होंने अपना जीवन खो दिया हो। और इसलिए, जैसे ही लोग प्रभु में विश्वास करते हैं वे बाइबल पढ़ना, और बाइबल को याद करना आरम्भ कर देते हैं, और जितना ज़्यादा वे बाइबल को याद कर पाते हैं, उतना ही ज़्यादा यह साबित होता है कि वे प्रभु से प्रेम करते हैं और बड़े विश्वासी हैं। वे जिन्होंने बाइबल को पढ़ा है और उसके बारे में दूसरों को बोल सकते हैं वे सभी अच्छे भाई और बहन हैं। इन सारे वर्षों में, प्रभु के प्रति लोगों के विश्वास और उनकी वफादारी को बाइबल की उनकी समझ के विस्तार के अनुसार मापा गया है। अधिकांश लोग साधारण तौर पर यह नहीं समझते हैं कि उन्हें परमेश्वर पर क्यों विश्वास करना चाहिए, और न ही यह समझते हैं कि परमेश्वर पर कैसे विश्वास करना है, किन्तु बाइबल के अध्यायों का गूढ़ार्थ निकालने के लिए आँख बंद करके सुरागों ढूँढ़ने के अलावा और कुछ भी नहीं करते हैं। लोगों ने कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा का अनुसरण नहीं किया है; शुरूआत से ही, उन्होंने हताशापूर्ण ढंग से बाइबल का अध्ययन और उसकी खोजबीन करने के अलावा और कुछ नहीं किया है, और किसी ने कभी भी बाइबल के बाहर पवित्र आत्मा के नवीनतम कार्य को नहीं पाया है, कोई कभी भी बाइबल से दूर नहीं गया है, और न ही उसने कभी बाइबल से दूर जाने की हिम्मत की है। लोगों ने इन सभी वर्षों में बाइबल का अध्ययन किया है, वे बहुत सी व्याख्याओं के साथ सामने आए हैं, और बहुत सा काम किया है; उनमें भी बाइबल के बारे में कई मतभेद हैं, जिस पर वे अंतहीन रूप से वाद-विवाद करते हैं, इतना कि आज दो हज़ार से ज़्यादा अलग-अलग सम्प्रदाय बन गए हैं। वे सभी कुछ विशेष व्याख्याओं, या बाइबल के अधिक गम्भीर रहस्यों का पता लगाना चाहते हैं, वे इसकी खोज करना चाहते हैं, और इसे इस्राएल में यहोवा के कार्य की पृष्ठभूमि में, या यहूदिया में यीशु के कार्य की पृष्ठभूमि में, या और अधिक रहस्यों को ढूँढ़ना चाहते हैं जिन्हें कोई नहीं जानता है। लोग धुन और विश्वास के साथ बाइबल के समीप जाते हैं, और बाइबल की भीतरी कहानी या सार के बारे में कोई भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सकता है। इसलिए आज, जब बाइबल की बात आती है तो लोगों के पास अभी भी जादुईगिरी का एक अवर्णनीय एहसास है और वे इससे और भी अधिक ग्रस्त हैं, और उस पर और भी अधिक विश्वास करते हैं। आज, हर कोई बाइबल में अंत के दिनों के कार्य की भविष्यवाणियों का पता लगाना चाहता है, वह यह खोज करना चाहता है कि अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर क्या कार्य करता है, और अंत के दिनों के क्या लक्षण हैं। इस तरह से, बाइबल की उनकी आराधना और उत्कट हो जाती है, और यह जितना ज़्यादा अंत के दिनों के नज़दीक आती है, उतना ही ज़्यादा वे बाइबल की भविष्यवाणियों को अंधी विश्वसनीयता देने लगते हैं, विशेषकर उनको जो अंत के दिनों के बारे में हैं। बाइबल में ऐसे अन्धे विश्वास के साथ, बाइबल में ऐसे भरोसे के साथ, उनमें पवित्र आत्मा के कार्य को खोजने की कोई इच्छा नहीं होती है। अपनी अवधारणाओं के अनुसार, लोग सोचते हैं कि केवल बाइबल ही पवित्र आत्मा के कार्य को ला सकती है; केवल बाइबल में ही वे परमेश्वर के पदचिह्नों को खोज सकते हैं; केवल बाइबल में ही परमेश्वर के कार्य के रहस्य छिपे हुए हैं; केवल बाइबल—न कि अन्य पुस्तकें या लोग—परमेश्वर के बारे में हर बात को और उनके कार्य की सम्पूर्णता को स्पष्ट कर सकती है; बाइबल स्वर्ग के कार्य को पृथ्वी पर ला सकती है; और बाइबल युगों का आरंभ और अंत दोनों कर सकती है। इन अवधारणाओं के साथ, लोगों का पवित्र आत्मा के कार्य को खोजने की ओर कोई झुकाव नहीं होता है। अतः इस बात की परवाह किए बिना कि अतीत में बाइबल लोगों के लिए कितनी मददगार थी, यह परमेश्वर के नवीनतम कार्य के लिए एक बाधा बन गई है। बाइबल के बिना, लोग अन्य स्थानों पर परमेश्वर के पदचिह्नों को खोज सकते हैं, फिर भी आज, उसके कदमों को बाइबल के द्वारा “रोक लिया” गया है, और उसके नवीनतम कार्य को बढ़ाना दोगुना कठिन, और एक मुश्किल संघर्ष बन गया है। यह सब बाइबल के प्रसिद्ध अध्यायों एवं कथनों, और साथ ही बाइबल की विभिन्न भविष्यवाणियों की वजह से है। बाइबल लोगों के मनों में एक आदर्श बन चुकी है, यह उनके मस्तिष्कों में एक पहेली बन चुकी है, वे मात्र यह विश्वास करने में असमर्थ हैं कि परमेश्वर बाइबल से अलग भी काम कर सकता है, वे यह विश्वास करने में बिल्कुल असमर्थ हैं कि लोग बाइबल के बाहर भी परमेश्वर को पा सकते हैं, और वे यह बिलकुल भी विश्वास करने में सक्षम नहीं हैं कि परमेश्वर अंतिम कार्य के दौरान बाइबल से दूर जा सकता है और एक नए सिरे से शुरू कर सकता है। यह लोगों के लिए अकल्पनीय है; वे इस पर विश्वास नहीं कर सकते हैं, और न ही वे इसकी कल्पना कर सकते हैं। लोगों द्वारा परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने में बाइबल एक बहुत बड़ी बाधा बन चुकी है, और इसने परमेश्वर के लिए इस नए कार्य का विस्तार करना कठिन बना दिया है। इस प्रकार, यदि तुम लोग बाइबल की भीतर की कहानी को नहीं समझते हो, तो तुम लोग सुसमाचार को सफलतापूर्वक फैलाने में सक्षम नहीं होगे, और न ही तुम लोग नए कार्य के गवाह बनने के योग्य होगे। यद्यपि, आज, तुम लोग बाइबल को नहीं पढ़ते हो, फिर भी तुम लोग उसके प्रति अभी भी अत्यधिक स्नेह से भरे हुए हो, कहने का अर्थ है कि, हो सकता है कि बाइबल तुम लोगों के हाथों में नहीं हो, किन्तु तुम लोगों की बहुत सी अवधारणाएँ उसी से आती हैं। तुम लोग बाइबल के उद्गमों या परमेश्वर के कार्य के पिछले दो चरणों के बारे में भीतर की कहानी को नहीं समझते हो। यद्यपि तुम लोग बाइबल अक्सर नहीं पढ़ते हो, फिर भी तुम लोगों को बाइबल को समझना चाहिए, तुम लोगों को बाइबल का सही ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, और केवल इस तरह से ही तुम लोग जान सकते हो कि परमेश्वर के 6,000 सालों की प्रबन्धन योजना कुल मिलाकर किस बारे में है। लोगों को जीतने के लिए, लोगों से यह स्वीकार कराने के लिए कि यह धारा ही सच्चा मार्ग है, उनसे यह स्वीकार कराने के लिए कि जिस पथ पर आज तुम लोग चल रहे हो वही सत्य का मार्ग है, कि यह पवित्र आत्मा के द्वारा मार्गदर्शित होता है, और इसे किसी भी मनुष्य के द्वारा खोला नहीं गया है। पढना जारी रखे

Hindi Christian Song | अंतिम दिनों का मसीह लाता है राज्य का युग (Lyrics)

Hindi Christian Song | अंतिम दिनों का मसीह लाता है राज्य का युग (Lyrics)

ओ ईश्वर!
जब मानव जगत में यीशु आया,
व्यवस्था के युग को समाप्त कर, अनुग्रह का युग लाया।
बना फिर देहधारी अंतिम दिनों में परमेश्वर।
अनुग्रह के युग को समाप्त कर, राज्य का युग लाया।
ओ ईश्वर! ओ ईश्वर!
परमेश्वर का दूजा देहधारण है जिन्हें स्वीकार
वे राज्य के युग में ले जाये जायेंगे, और उसकी रहनुमाई पायेंगे।
मानवता की मुक्ति ख़ातिर यीशु ने उनके संग रहकर काम किया,
मानव के पापों की ख़ातिर ख़ुद अपना बलिदान किया।
फिर भी गया न मानव का खोटा स्वभाव।
ओ ईश्वर! ओ ईश्वर!
शैतान के दूषित असर से मानव को बचाने की ख़ातिर,
यीशु की पाप-बलि काफ़ी नहीं है।
काम परमेश्वर को व्यापक करना होगा
शैतान द्वारा कलंकित स्वभाव से मानव को छुड़ाना होगा।

देकर माफ़ी मानव को उसके पापों के लिये,
देह में परमेश्वर फिर लौट आया, ले जाने मानव को नवयुग में,
ताड़ना और न्याय के युग में,
मानव को ऊंचे राज्य में ले जाने।

जो समर्पित उसकी प्रभुता में होंगे
पायेंगे वो सत्य ऊंचा और अनंत आशीष।
आह, वे रहेंगे रोशनी में!
और मिलेगी राह, सच और ज़िंदगी उनको!
ओ ईश्वर! ओ ईश्वर!
“मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना” से

 

यीशु मसीह के गीत— दो हज़ार सालों की अभिलाषा—प्रभु यीशु से मिलने हेतु अधीर

Praise and worship songs in hindi – A Collection of Hymns – Well Worth Listening to