प्रभु यीशु की वापसी के दो रास्ते हैं

प्रभु की वापसी के बारे में बाइबल की भविष्यवाणियों में सिर्फ़ उसका बादलों पर खुले तौर पर आना ही शामिल नहीं है, बल्कि एक चोर के रूप में गुप्त रूप से आना भी शामिल है। तो फिर, ये दोनों भविष्यवाणियां कैसे पूरी होंगी? अगर हम सिर्फ़ बादलों पर प्रभु के आने की प्रतीक्षा करते हैं, और एक चोर के रूप में उसके आने की भविष्यवाणी को अनदेखा कर देते हैं, तो क्या हम प्रभु के आगमन का स्वागत कर पायेंगे?


संदर्भ के लिए बाइबल के पद

“तुम भी तैयार रहो; क्योंकि जिस घड़ी तुम सोचते भी नहीं, उसी घड़ी मनुष्य का पुत्र आ जाएगा” (लूका 12:40)।

“देख, मैं चोर के समान आता हूँ ” (प्रकाशितवाक्य 16:15)।

“देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ” (प्रकाशितवाक्य 3:20)।

“आधी रात को धूम मची: ‘देखो, दूल्हा आ रहा है! उससे भेंट करने के लिये चलो'” (मत्ती 25:6)।

“क्योंकि जैसे बिजली आकाश के एक छोर से कौंध कर आकाश के दूसरे छोर तक चमकती है, वैसे ही मनुष्य का पुत्र भी अपने दिन में प्रगट होगा। परन्तु पहले अवश्य है कि वह बहुत दु:ख उठाए, और इस युग के लोग उसे तुच्छ ठहराएँ” (लूका 17:24-25)।

“देखो, वह बादलों के साथ आनेवाला है, और हर एक आँख उसे देखेगी, वरन् जिन्होंने उसे बेधा था वे भी उसे देखेंगे, और पृथ्वी के सारे कुल उसके कारण छाती पीटेंगे। हाँ। आमीन” (प्रकाशितवाक्य 1:7)।

“तब मनुष्य के पुत्र का चिह्न आकाश में दिखाई देगा, और तब पृथ्वी के सब कुलों के लोग छाती पीटेंगे; और मनुष्य के पुत्र को बड़ी सामर्थ्य और ऐश्‍वर्य के साथ आकाश के बादलों पर आते देखेंगे” (मत्ती 24:30)।


परमेश्वर के प्रासंगिक वचन

परमेश्वर के वचन

कई हज़ार सालों से, मनुष्य ने उद्धारकर्त्ता के आगमन को देखने में सक्षम होने की लालसा की है। मनुष्य ने उद्धारकर्त्ता यीशु को देखने की इच्छा की है जब वह एक सफेद बादल पर सवार होकर स्वयं उन लोगों के बीच उतरता है जिन्होंने हज़ारों सालों से उसकी अभिलाषा की है और उसके लिए लालायित रहे हैं। मनुष्य ने उद्धारकर्त्ता की वापसी और लोगों के साथ उसके फिर से जुड़ने की लालसा की है, अर्थात्, उद्धारकर्त्ता यीशु के उन लोगों के पास वापस आने की लालसा की है जिनसे वह हज़ारों सालों से अलग रहा है। और मनुष्य आशा करता है कि वह एक बार फिर से छुटकारे के उस कार्य को करेगा जो उसने यहूदियों के बीच किया था, वह मनुष्य के प्रति करूणामय और प्रेममय होगा, मनुष्य के पापों को क्षमा करेगा, वह मनुष्य के पापों को वहन करेगा, और यहाँ तक कि वह मनुष्य के सभी अपराधों को वहन करेगा और मनुष्य को उसके पापों से मुक्त करेगा। वे उद्धारकर्त्ता यीशु के पहले के समान होने की लालसा करते हैं—ऐसा उद्धारकर्त्ता जो प्यारा, सौम्य और आदरणीय हो, जो मनुष्य के प्रति कभी भी कोप से भरा हुआ न हो, और जो कभी भी मनुष्य को धिक्कारता न हो। यह उद्धारकर्त्ता मनुष्य के सारे पापों को क्षमा करता है और उन्हें वहन करता है, और यहाँ तक कि एक बार फिर से मनुष्य के लिए सलीब पर अपनी जान देता है। जब से यीशु गया है, वे चेले जो उसका अनुसरण करते थे, और वे सभी संत जिन्हें उसके नाम के कारण बचाया गया था, सभी बेसब्री से उसकी अभिलाषा और इन्तज़ार कर रहे हैं। वे सभी जो अनुग्रह के युग के दौरान यीशु मसीह के अनुग्रह के द्वारा बचाए गए थे, वे अंत के दिनों के दौरान उस आनन्ददायक दिन की लालसा कर रहे हैं, जब उद्धारकर्त्ता यीशु सफेद बादल पर आता है और मनुष्य के बीच में प्रकट होता है। निस्संदेह, यह उन सभी लोगों की सामूहिक इच्छा भी है जो आज उद्धारकर्त्ता यीशु के नाम को स्वीकार करते हैं। विश्व भर में, वे सभी जो उद्धारकर्त्ता यीशु के उद्धार को जानते हैं वे सभी यीशु मसीह की अचानक वापसी के लिए बहुत ज़्यादा लालायित रहे हैं, ताकि पृथ्वी पर यीशु के वचन पूरे हों: “मैं जैसे गया था वैसे ही मैं वापस आऊँगा।” मनुष्य विश्वास करता है कि सलीब पर चढ़ने और पुनरूत्थान के बाद, यीशु सफेद बादल पर स्वर्ग में वापस चला गया, और उसने सर्वोच्च महान परमेश्वर के दाएँ हाथ पर अपना स्थान ग्रहण किया। मनुष्य कल्पना करता है कि उसी प्रकार, यीशु फिर से सफेद बादल पर सवार होकर (यह बादल उस बादल की ओर संकेत करता है जिस पर यीशु तब सवार हुआ था जब वह स्वर्ग में वापस गया था), उन लोगों के बीच वापस आएगा जिन्होंने हज़ारों सालों से उसके लिए बहुत अधिक लालसा रखी है, और यह कि वह यहूदियों का स्वरूप और उनके कपड़े धारण करेगा। मनुष्य के सामने प्रकट होने के बाद, वह उन्हें भोजन प्रदान करेगा, और उनके लिए जीवन के जल की बौछार करवाएगा, और मनुष्य के बीच में रहेगा, वह अनुग्रह और प्रेम से भरपूर, जीवन्त और वास्तविक होगा, इत्यादि। फिर भी उद्धारकर्त्ता यीशु ने ऐसा नहीं किया; उसने मनुष्य की कल्पना के विपरीत किया। वह उन लोगों के बीच में नहीं आया जिन्होंने उसकी वापसी की लालसा की थी, और वह सफेद बादल पर सवार होकर सभी मनुष्यों के सामने प्रकट नहीं हुआ। वह तो पहले से ही आ चुका है, किन्तु मनुष्य उससे अनभिज्ञ ही है, और उसके आगमन से अनजान बना हुआ है। मनुष्य केवल निरुद्देश्यता से उसका इन्तज़ार कर रहा है, इस बात से अनभिज्ञ कि वह तो पहले ही “सफेद बादल” (वह बादल जो उसका आत्मा, उसके वचन, उसका सम्पूर्ण स्वभाव और उसका स्वरूप है) पर उतर चुका है, और वह अब उन विजेताओं के समूह के बीच में है जिसे वह अंत के दिनों के दौरान बनाएगा। मनुष्य इसे नहीं जानता हैः यद्यपि पवित्र उद्धारकर्त्ता यीशु मनुष्य के प्रति स्नेह और प्रेम से भरपूर है, फिर भी वह अशुद्ध और अपवित्र आत्माओं से भरे “मन्दिरों” में कैसे कार्य कर सकता है? यद्यपि मनुष्य उसके आगमन का इन्तज़ार करता आ रहा है, फिर भी वह उनके सामने कैसे प्रकट हो सकता है जो अधर्मी का मांस खाते हैं, अधर्मी का रक्त पीते हैं, एवं अधर्मी के वस्त्र पहनते हैं, जो उस पर विश्वास तो करते हैं परन्तु उसे जानते नहीं हैं, और लगातार उससे जबरदस्ती माँगते रहते हैं? मनुष्य केवल यही जानता है कि उद्धारकर्त्ता यीशु प्रेम और करुणा से परिपूर्ण है, और वह एक पाप बलि है जो छुटकारे से भरपूर है। परन्तु मनुष्य को पता नहीं है कि वह स्वयं परमेश्वर भी है, जो धार्मिकता, प्रताप, कोप, और न्याय से लबालब भरा हुआ है, और अधिकार और गौरव से संपन्न है। और इस प्रकार यद्यपि मनुष्य छुटकारा दिलाने वाले की वापसी के लिए लालायित रहता है और अभिलाषा करता है, और यहाँ तक कि मनुष्य की प्रार्थनाओं से स्वर्ग भी द्रवित हो जाता है, फिर भी उद्धारकर्त्ता यीशु उन लोगों के सामने प्रकट नहीं होता है जो उस पर विश्वास तो करते हैं किन्तु उसे जानते नहीं हैं।

— “उद्धारकर्त्ता पहले ही एक ‘सफेद बादल’ पर सवार होकर वापस आ चुका है” से उद्धृत

अनुग्रह के युग के अंत में, अंतिम युग आ गया है, और यीशु पहले ही आ चुका है। उसे अभी भी यीशु कैसे कहा जा सकता है? वह अभी भी मनुष्यों के बीच यीशु का रूप कैसे धर सकता है? क्या तुम भूल गए हो कि यीशु केवल नाज़री की छवि से अधिक नहीं था? क्या तुम भूल गए हो कि यीशु केवल मानवजाति को छुटकारा दिलाने वाला था? वह अंत के दिनों में मनुष्य को जीतने और पूर्ण करने का कार्य हाथ में कैसे ले सकता था? यीशु एक सफेद बादल पर सवार होकर चला गया—यह तथ्य है—किंतु वह मनुष्यों के बीच एक सफेद बादल पर सवार होकर कैसे वापस आ सकता है और अभी भी उसे यीशु कैसे कहा जा सकता है? यदि वह वास्तव में बादल पर आया होता, तो मनुष्य उसे पहचानने में कैसे विफल होता? क्या दुनिया भर के लोग उसे नहीं पहचानते? उस स्थिति में, क्या यीशु एकमात्र परमेश्वर नहीं होता? उस स्थिति में, परमेश्वर की छवि एक यहूदी की छवि होती, और इतना ही नहीं, वह हमेशा ऐसी ही रहती। यीशु ने कहा था कि वह उसी तरह से आएगा जैसे वह गया था, किंतु क्या तुम उसके वचनों का सही अर्थ जानते हो? क्या ऐसा हो सकता है कि ऐसा उसने तुम लोगों के इस समूह से कहा हो? तुम केवल इतना ही जानते हो कि वह उसी तरह से आएगा जैसे वह गया था, एक बादल पर सवार होकर, किंतु क्या तुम जानते हो कि स्वयं परमेश्वर वास्तव में अपना कार्य कैसे करता है? यदि तुम सच में देखने में समर्थ होते, तब यीशु के द्वारा बोले गए वचनों को कैसे समझाया जाता? उसने कहा था : जब अंत के दिनों में मनुष्य का पुत्र आएगा, तो उसे स्वयं ज्ञात नहीं होगा, फ़रिश्तों को ज्ञात नहीं होगा, स्वर्ग के दूतों को ज्ञात नहीं होगा, और समस्त मनुष्यों को ज्ञात नहीं होगा। केवल परमपिता को ज्ञात होगा, अर्थात् केवल पवित्रात्मा को ज्ञात होगा। जिसे स्वयं मनुष्य का पुत्र नहीं जानता, तुम उसे देखने और जानने में सक्षम हो? यदि तुम जानने और अपनी आँखों से देखने में समर्थ होते, तो क्या ये वचन व्यर्थ में बोले गए नहीं होते? और उस समय यीशु ने क्या कहा था? “उस दिन और उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता, न स्वर्ग के दूत और न पुत्र, परन्तु केवल पिता। जैसे नूह के दिन थे, वैसा ही मनुष्य के पुत्र का आना भी होगा। … इसलिये तुम भी तैयार रहो, क्योंकि जिस घड़ी के विषय में तुम सोचते भी नहीं हो, उसी घड़ी मनुष्य का पुत्र आ जाएगा।” जब वह दिन आएगा, तो स्वयं मनुष्य के पुत्र को उसका पता नहीं चलेगा। मनुष्य का पुत्र देहधारी परमेश्वर के देह को संदर्भित करता है, जो एक सामान्य और साधारण व्यक्ति है। जब स्वयं मनुष्य का पुत्र भी नहीं जानता, तो तुम कैसे जान सकते हो? यीशु ने कहा था कि वह वैसे ही आएगा, जैसे वह गया था। जब वह आता है, तो वह स्वयं भी नहीं जानता, तो क्या वह तुम्हें अग्रिम रूप में सूचित कर सकता है? क्या तुम उसका आगमन देखने में सक्षम हो? क्या यह एक मज़ाक नहीं है?

— ‘परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)’ से उद्धृत

परमेश्वर ने चीन की मुख्य भूमि में देहधारण किया है, जिसे हांगकांग और ताइवान के हमवतन लोग “आंतरिक भाग” कहते हैं। जब परमेश्वर ऊपर से पृथ्वी पर आया, तो स्वर्ग में और पृथ्वी पर कोई इसके बारे में नहीं जानता था, क्योंकि यही परमेश्वर का एक गुप्त हालत में लौटने का वास्तविक अर्थ है। वह लंबे समय से देह में रहकर कार्य कर रहा है, फिर भी इसके बारे में कोई नहीं जानता। यहाँ तक कि आज भी इसे कोई नहीं पहचानता। शायद यह एक शाश्वत पहेली बनी रहेगी। इस बार परमेश्वर का देह में आना ऐसा नहीं है, जिसके बारे कोई मनुष्य नहीं जान सकता। पवित्रात्मा का कार्य चाहे कितने भी बड़े पैमाने का और कितना भी शक्तिशाली हो, परमेश्वर हमेशा भावहीन बना रहता है, अपने बारे में कभी कुछ नहीं बताता। कोई कह सकता है कि उसके कार्य का यह चरण ऐसा है, मानो स्वर्ग के क्षेत्र में हो रहा हो। यद्यपि यह हर उस व्यक्ति को बिल्कुल स्पष्ट है, जिसके पास देखने के लिए आँखें हैं, किंतु कोई इसे नहीं पहचानता। जब परमेश्वर अपने कार्य के इस चरण को समाप्त कर लेगा, तो हर मनुष्य अपना सामान्य रवैया छोड़ देगा[1] और अपने लंबे सपने से जाग जाएगा। मुझे याद है, परमेश्वर ने एक बार कहा था, “इस बार देह में आना शेर की माँद में गिरने जैसा है।” इसका अर्थ यह है कि, चूँकि परमेश्वर के कार्य के इस चक्र में परमेश्वर देह में आता है और इतना ही नहीं, बड़े लाल अजगर के निवास-स्थान में पैदा होता है, इसलिए इस बार धरती पर आकर वह पहले से भी अधिक बड़े ख़तरे का सामना करता है। वह चाकुओं, बंदूकों, लाठियों और डंडों का सामना करता है; वह प्रलोभन का सामना करता है; वह हत्या के इरादे से भरे चेहरों वाली भीड़ का सामना करता है। वह किसी भी समय मारे जाने का जोख़िम उठाता है। परमेश्वर अपने साथ कोप लेकर आया। किंतु वह पूर्णता का कार्य करने के लिए आया, जिसका अर्थ है कि वह कार्य का दूसरा भाग करने के लिए आया, जो छुटकारे के कार्य के बाद जारी रहता है। अपने कार्य के इस चरण के वास्ते, परमेश्वर ने अत्यधिक विचार किया है और इस पर अत्यधिक ध्यान दिया है, और स्वयं को विनम्रतापूर्वक छिपाते हुए और अपनी पहचान का कभी घमंड न करते हुए, प्रलोभन के हमलों से बचने के लिए हर कल्पनीय साधन का उपयोग कर रहा है। सलीब से मनुष्य को बचाने में यीशु केवल छुटकारे का कार्य पूरा कर रहा था; वह पूर्णता का कार्य नहीं कर रहा था। इस प्रकार परमेश्वर का केवल आधा कार्य ही किया जा रहा था, छुटकारे का कार्य पूरा करना उसकी संपूर्ण योजना का केवल आधा भाग ही था। चूँकि नया युग शुरू और पुराना युग समाप्त होने वाला था, इसलिए परमपिता परमेश्वर ने अपने कार्य के दूसरे हिस्से पर विचार करना शुरू किया और उसके लिए तैयारी करनी शुरू कर दी। अंत के दिनों में इस देहधारण की भविष्यवाणी अतीत में स्पष्ट रूप से नहीं की गई थी, जिसके परिणामस्वरूप इस बार परमेश्वर के देह में आने को लेकर अधिक गोपनीयता की नींव रखी गई। भोर के समय, अधिकांश लोगों की जानकारी में आए बिना, परमेश्वर पृथ्वी पर आया और देह में अपना जीवन शुरू कर दिया। लोग इस क्षण के आगमन से अनभिज्ञ थे। कदाचित वे सब घोर निद्रा में थे, कदाचित बहुत-से लोग जो सतर्कतापूर्वक जागे हुए थे, प्रतीक्षा कर रहे थे, और कदाचित कई लोग स्वर्ग के परमेश्वर से चुपचाप प्रार्थना कर रहे थे। किंतु इन सभी अनेक लोगों के बीच, एक भी व्यक्ति नहीं जानता था कि परमेश्वर पहले ही पृथ्वी पर आ चुका है। परमेश्वर ने ऐसा इसलिए किया, ताकि वह अपना कार्य अधिक सुचारु रूप से कर सके और बेहतर परिणाम प्राप्त कर सके, और साथ ही, पहले से अधिक प्रलोभनों की पहले से रोकथाम कर सके। जब मनुष्य की वसंत की नींद टूटेगी, तो परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही समाप्त हो गया होगा और वह पृथ्वी पर भ्रमण और अस्थायी निवास का अपना जीवन पूरा करके चला जाएगा। चूँकि परमेश्वर के कार्य के लिए परमेश्वर का व्यक्तिगत रूप से कार्य करना और बोलना आवश्यक है, और चूँकि उसमें मनुष्य के हस्तक्षेप करने का कोई उपाय नहीं है, इसलिए परमेश्वर ने स्वयं कार्य करने हेतु पृथ्वी पर आने के लिए अत्यधिक पीड़ा सही है। मनुष्य परमेश्वर के कार्य के लिए उसका स्थान लेने में असमर्थ है। इसलिए परमेश्वर ने पृथ्वी पर अपना स्वयं का कार्य करने, अपनी समस्त सोच और देखरेख दरिद्र लोगों के इस समूह को, गोबर के ढेर में पड़े लोगों के इस समूह को छुटकारा दिलाने हेतु, उस स्थान पर आने के लिए जहाँ बड़ा लाल अजगर निवास करता है, अनुग्रह के युग के ख़तरों की अपेक्षा कई हजार गुना बड़े ख़तरे उठाने का जोखिम लिया है। यद्यपि कोई भी व्यक्ति परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में नहीं जानता, फिर भी परमेश्वर परेशान नहीं है, क्योंकि इससे परमेश्वर के कार्य में बहुत लाभ मिलता है। चूँकि हर कोई परम नृशंस और दुष्ट है, इसलिए वे परमेश्वर के अस्तित्व को कैसे बरदाश्त कर सकते हैं? यही कारण है कि पृथ्वी पर परमेश्वर हमेशा चुपचाप आता है। हालाँकि मनुष्य क्रूरता की निकृष्टतम अतियों में डूब चूका है, फिर भी परमेश्वर उनमें से किसी को भी गंभीरता से नहीं लेता, बल्कि उस कार्य को करता रहता है जिसे करने की उसे आवश्यकता है, ताकि उस बड़े कार्यभार को पूरा कर सके, जो स्वर्गिक पिता ने उसे सौंपा है।

— ‘कार्य और प्रवेश (4)’ से उद्धृत

देहधारी बना परमेश्वर स्वयं को सभी प्राणियों के बजाय केवल लोगों के उस हिस्से पर ही अभिव्यक्त करता है, जो उस अवधि के दौरान उसका अनुसरण करते हैं, जब वह व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है। वह केवल अपने कार्य के एक चरण को पूरा करने के लिए देह बनता है, मनुष्य को अपनी छवि दिखाने के लिए नहीं। चूँकि उसका कार्य स्वयं उसके द्वारा ही किया जाना चाहिए, इसलिए उसका देह में ऐसा करना आवश्यक है। जब यह कार्य पूरा हो जाएगा, तो वह मनुष्य की दुनिया से चला जाएगा; वह इस डर से लंबी अवधि तक मानव-जाति के बीच बना नहीं रह सकता, कि कहीं वह आगामी कार्य के मार्ग में बाधा न बन जाए। जो कुछ वह जनसाधारण पर प्रकट करता है, वह केवल उसका धार्मिक स्वभाव और उसके समस्त कर्म हैं, अपने दो बार के देहधारणों की छवि नहीं, क्योंकि परमेश्वर की छवि केवल उसके स्वभाव के माध्यम से ही प्रदर्शित की जा सकती है, और उसे उसके देह की छवि से बदला नहीं जा सकता। उसके देह की छवि केवल लोगों की एक सीमित संख्या को, केवल उन लोगों को ही दिखाई जाती है, जो तब उसका अनुसरण करते हैं जब वह देह में कार्य करता है। इसीलिए जो कार्य अब किया जा रहा है, वह इस तरह गुप्त रूप से किया जा रहा है। इसी तरह से, यीशु ने जब अपना कार्य किया, तो उसने स्वयं को केवल यहूदियों को ही दिखाया, और अपने आप को कभी भी किसी दूसरे देश को सार्वजनिक रूप से नहीं दिखाया। इस प्रकार, जब एक बार उसने अपना काम समाप्त कर लिया, तो वह तुरंत ही मनुष्यों के बीच से चला गया और रुका नहीं; उसके बाद वह मनुष्य की उस छवि में नहीं रहा, जिसने स्वयं को मनुष्य को दर्शाया था, बल्कि वह पवित्र आत्मा था, जिसने सीधे तौर पर कार्य किया। एक बार जब देहधारी बने परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से समाप्त हो जाता है, तो वह नश्वर संसार से चला जाता है, और फिर कभी उस तरह का कार्य नहीं करता, जो उसने तब किया था, जब वह देह में था। इसके बाद का समस्त कार्य पवित्र आत्मा द्वारा सीधे तौर पर किया जाता है। इस अवधि के दौरान मनुष्य मुश्किल से ही उसके हाड़-मांस के शरीर की छवि को देखने में समर्थ होता है; वह स्वयं को मनुष्य पर बिलकुल भी प्रकट नहीं करता, बल्कि हमेशा छिपा रहता है। देहधारी बने परमेश्वर के कार्य के लिए समय सीमित होता है। वह एक विशेष युग, अवधि, देश और विशेष लोगों के बीच किया जाता है। वह कार्य केवल परमेश्वर के देहधारण की अवधि के दौरान के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, और वह विशेषकर उस युग का होता है; वह एक युग-विशेष में परमेश्वर के आत्मा के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, उसके कार्य की संपूर्णता का नहीं। इसलिए, देहधारी बने परमेश्वर की छवि सभी लोगों को नहीं दिखाई जाती। जनसाधारण को जो दिखाया जाता है, वह परमेश्वर की धार्मिकता और अपनी संपूर्णता में उसका स्वभाव होता है, न कि उसकी उस समय की छवि, जब वह दो बार देह बना। यह न तो एकल छवि है जो मनुष्य को दिखाई जाती है, और न ही दो छवियाँ संयुक्त हैं। इसलिए, यह अनिवार्य है कि देहधारी परमेश्वर का देह उस कार्य की समाप्ति पर पृथ्वी से चला जाए, जिसे करना उसके लिए आवश्यक है, क्योंकि वह केवल उस कार्य को करने आता है जो उसे करना चाहिए, लोगों को अपनी छवि दिखाने नहीं आता। यद्यपि देहधारण का अर्थ परमेश्वर द्वारा पहले ही दो बार देहधारण करके पूरा किया जा चुका है, फिर भी वह किसी ऐसे देश पर अपने आपको खुलकर प्रकट नहीं करेगा, जिसने उसे पहले कभी नहीं देखा है। यीशु फिर कभी स्वयं को धार्मिकता के सूर्य के रूप में यहूदियों को नहीं दिखाएगा, न ही वह जैतून के पहाड़ पर चढ़ेगा और सभी लोगों को दिखाई देगा; वह जो यहूदियों ने देखा है, वह यहूदिया में अपने समय के दौरान की यीशु की तसवीर है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि अपने देहधारण में यीशु का कार्य दो हजार वर्ष पहले समाप्त हो गया; वह यहूदी की छवि में वापस यहूदिया नहीं आएगा, एक यहूदी की छवि में अपने आप को किसी भी अन्यजाति राष्ट्र को तो बिलकुल भी नहीं दिखाएगा, क्योंकि यीशु के देहधारी होने की छवि केवल एक यहूदी की छवि है, मनुष्य के उस पुत्र की छवि नहीं है, जिसे यूहन्ना ने देखा था। यद्यपि यीशु ने अपने अनुयायियों से वादा किया था कि वह फिर आएगा, फिर भी वह अन्यजाति राष्ट्रों में स्वयं को मात्र यहूदी की छवि में नहीं दिखाएगा। तुम लोगों को यह जानना चाहिए कि परमेश्वर के देह बनने का कार्य एक युग का सूत्रपात करना है। यह कार्य कुछ वर्षों तक सीमित है, और वह परमेश्वर के आत्मा का समस्त कार्य पूरा नहीं कर सकता। इसी तरह से, एक यहूदी के रूप में यीशु की छवि केवल परमेश्वर की उस छवि का प्रतिनिधित्व कर सकती है, जब उसने यहूदिया में कार्य किया था, और वह केवल सलीब पर चढ़ने का कार्य ही कर सकता था। उस अवधि के दौरान, जब यीशु देह में था, वह युग का अंत करने या मानवजाति को नष्ट करने का कार्य नहीं कर सकता था। इसलिए, जब उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया, और उसने अपना कार्य समाप्त कर लिया, तब वह ऊँचे पर चढ़ गया और उसने हमेशा के लिए स्वयं को मनुष्य से छिपा लिया। तब से, अन्यजाति देशों के वे वफादार विश्वासी प्रभु यीशु की अभिव्यक्ति को देखने में असमर्थ हो गए, वे केवल उसके चित्र को देखने में ही समर्थ रहे, जिसे उन्होंने दीवार पर चिपकाया था। यह तसवीर सिर्फ मनुष्य द्वारा बनाई गई तसवीर है, न कि वह छवि, जो स्वयं परमेश्वर ने मनुष्य को दिखाई थी। परमेश्वर अपने आपको खुलकर अपने दो बार देह बनने की छवि में जनसाधारण को नहीं दिखाएगा। जो कार्य वह मनुष्यों के बीच करता है, वह इसलिए करता है ताकि वे उसके स्वभाव को समझ सकें। यह सब मनुष्य को भिन्न-भिन्न युगों के कार्य के माध्यम से दिखाया जाता है; यह उस स्वभाव के माध्यम से, जो उसने ज्ञात करवाया है और उस कार्य के माध्यम से, जो उसने किया है, संपन्न किया जाता है, यीशु की अभिव्यक्ति के माध्यम से नहीं। अर्थात्, मनुष्य को परमेश्वर की छवि देहधारी छवि के माध्यम से नहीं, बल्कि देहधारी परमेश्वर के द्वारा, जिसके पास छवि और आकार दोनों हैं, किए गए कार्य के माध्यम से ज्ञात करवाई जाती है; और उसके कार्य के माध्यम से उसकी छवि दिखाई जाती है और उसका स्वभाव ज्ञात करवाया जाता है। यही उस कार्य का अर्थ है, जिसे वह देह में करना चाहता है।

एक बार जब परमेश्वर के दो देहधारणों का कार्य समाप्त हो जाएगा, तो वह जनसाधारण को अपना स्वरूप देखने की अनुमति देते हुए समस्त अन्यजाति देशों में अपना धार्मिक स्वभाव दिखाना शुरू करेगा। वह अपने स्वभाव को अभिव्यक्त करेगा, और इसके माध्यम से विभिन्न श्रेणियों के मनुष्यों का अंत स्पष्ट करेगा, और इस प्रकार पुराने युग को पूरी तरह से समाप्त कर देगा। देह में उसका कार्य बड़ी सीमा तक विस्तारित नहीं होता (जैसे कि यीशु ने केवल यहूदिया में काम किया, और आज मैं केवल तुम लोगों बीच कार्य करता हूँ), जिसका कारण यह है कि देह में उसके कार्य की हदें और सीमाएँ हैं। वह एक साधारण और सामान्य देह में केवल एक अल्पावधि का कार्य करता है; वह इस धारित देह का उपयोग शाश्वतता का कार्य करने या अन्यजाति देशों के लोगों को दिखाई देने का कार्य करने के लिए नहीं करता। देह में किए जाने वाले कार्य को केवल दायरे में सीमित किया जा सकता है (जैसे कि सिर्फ यहूदिया में या सिर्फ तुम लोगों के बीच कार्य करना), और फिर, इन सीमाओं के भीतर किए गए कार्य के माध्यम से, इसके दायरे को तब विस्तारित किया जा सकता है। बेशक, विस्तार का कार्य सीधे तौर पर पवित्र आत्मा द्वारा किया जाता है और तब वह उसके द्वारा धारित देह का कार्य नहीं होगा। चूँकि देह में कार्य की सीमाएँ हैं और वह विश्व के समस्त कोनों तक नहीं फैलता—इसलिए वह इसे पूरा नहीं कर सकता। देह में कार्य के माध्यम से उसका आत्मा उस कार्य को करता है, जो उसके बाद आता है। इसलिए, देह में किया गया कार्य शुरुआती प्रकृति का होता है, जिसे कुछ निश्चित सीमाओं के भीतर किया जाता है; इसके बाद, उसका आत्मा उस कार्य को आगे बढ़ाता है, और इतना ही नहीं, ऐसा वह एक बढ़े हुए दायरे में करता है।

— ‘देहधारण का रहस्य (2)’ से उद्धृत

मैं तुम लोगों बता दूँ, कि जो परमेश्वर में संकेतों की वजह से विश्वास करते हैं, वे निश्चित रूप से उस श्रेणी के होंगे जो विनाश को झेलेगी। वे जो देह में लौटे यीशु के वचनों को स्वीकार करने में अक्षम हैं, वे निश्चित रूप से नरक के वंशज, महान फ़रिश्ते के वंशज हैं, उस श्रेणी के हैं जो अनंत विनाश के अधीन की जाएगी। कई लोग मैं क्या कहता हूँ इसकी परवाह नहीं करते हैं, किंतु मैं ऐसे हर तथाकथित संत को बताना चाहता हूँ जो यीशु का अनुसरण करते हैं, कि जब तुम लोग यीशु को एक श्वेत बादल पर स्वर्ग से उतरते हुए अपनी आँखों से देखो, तो यह धार्मिकता के सूर्य का सार्वजनिक प्रकटन होगा। शायद वह तुम्हारे लिए एक बड़ी उत्तेजना का समय होगा, मगर तुम्हें पता होना चाहिए कि जिस समय तुम यीशु को स्वर्ग से उतरते हुए देखोगे, यही वह समय भी होगा जब तुम दण्ड दिए जाने के लिए नीचे नरक में चले जाओगे। वह परमेश्वर की प्रबंधन योजना की समाप्ति का समय होगा, और यह तब होगा जब परमेश्वर सज्जन को पुरस्कार और दुष्ट को दण्ड देगा। क्योंकि परमेश्वर का न्याय मनुष्य के संकेतों को देखने से पहले ही समाप्त हो चुका होगा, जब वहाँ सिर्फ़ सत्य की अभिव्यक्ति ही होगी। वे जो सत्य को स्वीकार करते हैं तथा संकेतों की खोज नहीं करते हैं और इस प्रकार शुद्ध कर दिए जाते हैं, वे परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट चुके होंगे और सृष्टिकर्ता के आलिंगन में प्रवेश कर चुके होंगे। सिर्फ़ वे ही जो इस विश्वास में बने रहते हैं कि “ऐसा यीशु जो श्वेत बादल पर सवारी नहीं करता है एक झूठा मसीह है” अनंत दण्ड के अधीन कर दिए जाएँगे, क्योंकि वे सिर्फ़ उस यीशु में विश्वास करते हैं जो संकेतों को प्रदर्शित करता है, परन्तु उस यीशु को स्वीकार नहीं करते हैं जो गंभीर न्याय की घोषणा करता है और जीवन में सच्चे मार्ग को बताता है। इसलिए केवल यही हो सकता है कि जब यीशु खुलेआम श्वेत बादल पर वापस लौटें तो वह उसके साथ व्यवहार करें। वे बहुत हठधर्मी, अपने आप में बहुत आश्वस्त, बहुत अभिमानी हैं। ऐसे अधम लोग यीशु द्वारा कैसे पुरस्कृत किए जा सकते हैं? यीशु का लौटना उन लोगों के लिए एक महान उद्धार है जो सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं, परन्तु उनके लिए जो सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ हैं, यह निंदा का एक संकेत है।

— ‘जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, तब तक परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नया बना चुका होगा’ से उद्धृत



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