प्रभु की वापसी की भविष्यवाणियां मूलतः पूरी हो गयी हैं, इसने अंत के दिनों की खतरे की घंटी बजा दी है

मानवजाति का भ्रष्टाचार और बुराई अब सिर चढ़ आयी है और प्रभु की वापसी के बारे में बाइबल की भविष्यवाणियां वास्तव में पूरी हो गई हैं। पूरी दुनिया में आपदाएं अधिक से अधिक गंभीर होती जा रही हैं: भूकंप, महामारी, अकाल, और युद्ध लगातार हो रहे हैं, आकाश में भी दुर्लभ घटनाएं सामने आयी हैं। प्रभु की वापसी के दिन आ गये हैं, और कई धर्मनिष्ठ ईसाईयों का यह मानना है कि वह पहले ही वापस आ गया है…

संदर्भ के लिए बाइबल के पद

“जैसा नूह के दिनों में हुआ था, वैसा ही मनुष्य के पुत्र के दिनों में भी होगा। जिस दिन तक नूह जहाज पर न चढ़ा, उस दिन तक लोग खाते–पीते थे, और उनमें विवाह होते थे। तब जल-प्रलय ने आकर उन सब को नष्‍ट किया। और जैसा लूत के दिनों में हुआ था कि लोग खाते-पीते, लेन-देन करते, पेड़ लगाते और घर बनाते थे; परन्तु जिस दिन लूत सदोम से निकला, उस दिन आग और गन्धक आकाश से बरसी और सब को नष्‍ट कर दिया। मनुष्य के पुत्र के प्रगट होने के दिन भी ऐसा ही होगा” (लूका 17:26-30)।

“क्योंकि जाति पर जाति, और राज्य पर राज्य चढ़ाई करेगा, और जगह जगह अकाल पड़ेंगे, और भूकम्प होंगे। ये सब बातें पीड़ाओं का आरम्भ होंगी” (मत्ती 24:7-8)।

“मैं आकाश में और पृथ्वी पर चमत्कार, अर्थात् लहू और आग और धूएँ के खम्भे दिखाऊँगा। यहोवा के उस बड़े और भयानक दिन के आने से पहले सूर्य अन्धियारा होगा और चन्द्रमा रक्‍त सा हो जाएगा” (योएल 2:30-31)।

“जब उसने छठवीं मुहर खोली, तो मैं ने देखा कि एक बड़ा भूकम्प हुआ, और सूर्य कम्बल के समान काला और पूरा चंद्रमा लहू के समान हो गया। आकाश के तारे पृथ्वी पर ऐसे गिर पड़े जैसे बड़ी आँधी से हिलकर अंजीर के पेड़ में से कच्‍चे फल झड़ते हैं” (प्रकाशितवाक्य 6:12-13)।


परमेश्वर के प्रासंगिक वचन

सब कुछ जो परमेश्वर करता है उसकी योजना सटीकता के साथ बनाई जाती है। जब वह किसी चीज़ या परिस्थिति को घटित होते देखता है, तो उसकी दृष्टि में इसे नापने के लिए एक मापदंड होगा, और यह मापदंड निर्धारित करेगा कि इसके साथ निपटने के लिए वह किसी योजना की शुरुआत करता है या नहीं या उसे इस चीज़ एवं परिस्थिति के साथ किस प्रकार निपटना है। वह उदासीन नहीं है या उसके पास सभी चीज़ों के प्रति कोई भावनाएँ नहीं हैं। यह असल में पूर्णत: विपरीत है। यहाँ एक वचन है जिसे परमेश्वर ने नूह से कहा था: “सब प्राणियों के अन्त करने का प्रश्न मेरे सामने आ गया है; क्योंकि उनके कारण पृथ्वी उपद्रव से भर गई है, इसलिये मैं उनको पृथ्वी समेत नष्‍ट कर डालूँगा।” इस समय परमेश्वर के वचनों में, क्या उसने कहा था कि वह सिर्फ मनुष्यों का विनाश कर रहा था? नहीं! परमेश्वर ने कहा कि वह हाड़-मांस के सब जीवित प्राणियों का विनाश करने जा रहा था। परमेश्वर ने विनाश क्यों चाहा? यहाँ परमेश्वर के स्वभाव का एक और प्रकाशन है: परमेश्वर की दृष्टि में, मनुष्य की भ्रष्टता के प्रति, सभी प्राणियों की अशुद्धता, उपद्रव एवं अनाज्ञाकारिता के प्रति उसके धीरज की एक सीमा होती है। उसकी सीमा क्या है? यह ऐसा है जैसा परमेश्वर ने कहा था: “और परमेश्‍वर ने पृथ्वी पर जो दृष्‍टि की तो क्या देखा कि वह बिगड़ी हुई है; क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपना अपना चाल-चलन बिगाड़ लिया था।” इस वाक्यांश “क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपना अपना चाल-चलन बिगाड़ लिया था” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कोई भी जीवित प्राणी, परमेश्वर का अनुसरण करने वालों समेत, ऐसे लोग जो परमेश्वर का नाम पुकारते थे, ऐसे लोग जो किसी समय परमेश्वर को होमबलि चढ़ाते थे, ऐसे लोग जो मौखिक रूप से परमेश्वर को स्वीकार करते थे और यहाँ तक कि परमेश्वर की स्तुति भी करते थे—जब एक बार उनका व्यवहार भ्रष्टता से भर गया और परमेश्वर की दृष्टि तक पहुँच गया, तो उसे उन्हें नाश करना होगा। यह परमेश्वर की सीमा थी। अतः परमेश्वर किस हद तक मनुष्य एवं सभी प्राणियों की भ्रष्टता के प्रति सहनशील बना रहा? उस हद तक जब सभी लोग, चाहे परमेश्वर के अनुयायी हों या अविश्वासी, सही मार्ग पर नहीं चल रहे थे। उस हद तक कि मनुष्य केवल नैतिक रूप से भ्रष्ट और बुराई से भरा हुआ नहीं था, बल्कि जहाँ कोई व्यक्ति नहीं था जो परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करता था, किसी ऐसे व्यक्ति की तो बात ही छोड़ दीजिए जो विश्वास करता था कि परमेश्वर के द्वारा इस संसार पर शासन किया जाता है और यह कि परमेश्वर लोगों को ज्योति में और सही मार्ग पर ला सकता है। उस हद तक जहाँ मनुष्य ने परमेश्वर के अस्तित्व को तुच्छ जाना और परमेश्वर को अस्तित्व में रहने की अनुमति नहीं दी। जब एक बार मनुष्य की भ्रष्टता इस बिन्दु पर पहुँच गई, तो परमेश्वर के पास और अधिक धीरज नहीं होगा। इसके बजाए उसका स्थान कौन लेगा? परमेश्वर के क्रोध और परमेश्वर के दण्ड का आगमन। क्या यह परमेश्वर के स्वभाव का एक आंशिक प्रकाशन नहीं था? इस वर्तमान युग में, क्या परमेश्वर की दृष्टि में अभी भी कोई धर्मी मनुष्य है? क्या परमेश्वर की दृष्टि में अभी भी कोई सिद्ध मनुष्य है? क्या यह युग ऐसा युग है जिसके अंतर्गत परमेश्वर की दृष्टि में पृथ्वी पर सभी प्राणियों का व्यवहार भ्रष्ट हो गया है? आज के दिन और युग में, ऐसे लोगों को छोड़ कर जिन्हें परमेश्वर पूर्ण करना चाहता है, ऐसे लोग जो परमेश्वर का अनुसरण और उसके उद्धार को स्वीकार कर सकते हैं, क्या हाड़-मांस के सभी लोग परमेश्वर के धीरज की सीमा को चुनौती नहीं दे रहे हैं? क्या सभी चीज़ें जो तुम लोगों के आस-पास घटित होती हैं, जिन्हें तुम लोग अपनी आँखों से देखते हो और अपने कानों से सुनते हो, और इस संसार में व्यक्तिगत रूप से अनुभव करते हो उपद्रव से भरी हुई नहीं हैं? परमेश्वर की दृष्टि में, क्या एक ऐसे संसार, एवं ऐसे युग को समाप्त नहीं कर देना चाहिए? यद्यपि इस वर्तमान युग की पृष्ठभूमि नूह के समय की पृष्ठभूमि से पूर्णतः अलग है, फिर भी वे भावनाएँ एवं क्रोध जो मनुष्य की भ्रष्टता के प्रति परमेश्वर में है वे वैसी ही बनी रहती हैं जैसी वे पिछले समय में थीं। परमेश्वर अपने कार्य के कारण सहनशील होने में समर्थ है, किन्तु सब प्रकार की परिस्थितियों एवं हालातों के अनुसार, परमेश्वर की दृष्टि में इस संसार को बहुत पहले ही नष्ट कर दिया जाना चाहिए था। जैसा पिछले समय में था जब जलप्रलय के द्वारा संसार का विनाश किया गया था उसके लिहाज से परिस्थिति बिल्कुल अलग है।

— ‘परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I’ से उद्धृत

दुनिया के विशाल विस्तार में अनगिनत परिवर्तन हो चुके हैं, बार-बार गाद भरने से महासागर मैदानों में बदल रहे हैं, खेत बाढ़ से महासागरों में बदल रहे हैं। सिवाय उसके जो ब्रह्मांड में सभी चीज़ों पर शासन करता है, कोई भी इस मानव-जाति की अगुआई और मार्गदर्शन करने में समर्थ नहीं है। कोई ऐसा पराक्रमी नहीं है, जो इस मानव-जाति के लिए श्रम या तैयारी कर सकता हो, और ऐसा तो कोई भी नहीं है, जो इस मानव-जाति को प्रकाश की मंजिल की ओर ले जा सके और इसे सांसारिक अन्यायों से मुक्त कर सके। परमेश्वर मनुष्य-जाति के भविष्य पर विलाप करता है, वह मनुष्य-जाति के पतन पर शोक करता है, और उसे पीड़ा होती है कि मनुष्य-जाति, कदम-दर-कदम, क्षय और ऐसे मार्ग की ओर बढ़ रही है, जहाँ से वापसी संभव नहीं है। ऐसी मनुष्य-जाति, जिसने परमेश्वर का हृदय तोड़ दिया है और दुष्ट की तलाश करने के लिए उसका त्याग कर दिया है : क्या किसी ने कभी उस दिशा पर विचार किया है, जिस ओर ऐसी मनुष्य-जाति जा रही है? ठीक इसी कारण से कोई परमेश्वर के कोप को महसूस नहीं करता, कोई परमेश्वर को खुश करने का तरीका नहीं खोजता या परमेश्वर के करीब आने की कोशिश नहीं करता, और इससे भी अधिक, कोई परमेश्वर के दुःख और दर्द को समझने की कोशिश नहीं करता। परमेश्वर की वाणी सुनने के बाद भी मनुष्य अपने रास्ते पर चलता रहता है, परमेश्वर से दूर जाने, परमेश्वर के अनुग्रह और देखभाल से बचने, उसके सत्य से कतराने में लगा रहता है, अपने आप को परमेश्वर के दुश्मन, शैतान को बेचना पसंद करता है। और किसने इस बात पर कोई विचार किया है—क्या मनुष्य को अपनी जिद पर अड़े रहना चाहिए—कि परमेश्वर इस मानव-जाति के साथ कैसा व्यवहार करेगा, जिसने उसे मुड़कर एक नज़र देखे बिना ही खारिज कर दिया? कोई नहीं जानता कि परमेश्वर के बार-बार के अनुस्मारकों और आग्रहों का कारण यह है कि उसने अपने हाथों में एक अभूतपूर्व आपदा तैयार की है, एक ऐसी आपदा, जो मनुष्य की देह और आत्मा के लिए असहनीय होगी। यह आपदा केवल देह का ही नहीं, बल्कि आत्मा का भी दंड है। तुम्हें यह जानने की आवश्यकता है : जब परमेश्वर की योजना निष्फल होती है और जब उसके अनुस्मारकों और आग्रहों का कोई उत्तर नहीं मिलता, तो वह किस प्रकार का क्रोध प्रकट करेगा? यह ऐसा होगा, जिसे पहले किसी सृजित प्राणी ने कभी अनुभव किया या सुना नहीं होगा। और इसलिए मैं कहता हूँ, यह आपदा बेमिसाल है और कभी दोहराई नहीं जाएगी। क्योंकि परमेश्वर की योजना मनुष्य-जाति का केवल एक बार सृजन करने और उसे केवल एक बार बचाने की है। यह पहली बार है, और यही अंतिम बार भी है। इसलिए, जिन श्रमसाध्य इरादों और उत्साहपूर्ण प्रत्याशा से परमेश्वर इस बार इंसान को बचाता है, उसे कोई नहीं समझ सकता।

— ‘परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है’ से उद्धृत

अन्तिम दिन आ चुके हैं, और विश्वभर के देशों में अशान्ति है। राजनीतिक अस्त-व्यस्तता, अकाल, महामारी और बाढ़ें हैं, प्रत्येक स्थान पर अकाल पड़ रहे हैं। मानव-संसार पर महाविपत्ति है; स्वर्ग ने भी विनाश को नीचे भेज दिया है। ये अन्तिम दिनों के चिह्न हैं। परन्तु लोगों को यह आनन्द और वैभव जैसा संसार प्रतीत होता है, ऐसा संसार लगता है जो अधिक आनंद और वैभव से भरता चला जा रहा है। लोगों के हृदय इसकी ओर आकर्षित होते हैं और अनेक लोग फंस जाते हैं और स्वयं को इसके बन्धन से मुक्त करने में असमर्थ रहते हैं; बहुत अधिक संख्या में लोग उनके द्वारा मोहित किए जाएँगे जो धोखेबाज़ी और जादूटोने में संलिप्त हैं।

— ‘अभ्यास (2)’ से उद्धृत

एक के बाद एक सभी तरह की आपदाएँ आ पड़ेंगी; सभी राष्ट्र और स्थान आपदाओं का सामना करेंगे : हर जगह महामारी, अकाल, बाढ़, सूखा और भूकंप आएँगे। ये आपदाएँ सिर्फ एक-दो जगहों पर ही नहीं आएँगी, न ही वे एक-दो दिनों में समाप्त होंगी, बल्कि इसके बजाय वे बड़े से बड़े क्षेत्र तक फैल जाएँगी, और अधिकाधिक गंभीर होती जाएँगी। इस दौरान, एक के बाद एक सभी प्रकार की कीट-जनित महामारियाँ उत्पन्न होंगी, और हर जगह नरभक्षण की घटनाएँ होंगी। सभी राष्ट्रों और लोगों पर यह मेरा न्याय है।

— “आरंभ में मसीह के कथन” के ‘अध्याय 65’ से उद्धृत

अपनी आँखें खोलो और देखो, और तुम हर जगह मेरे महान सामर्थ्य को देख सकते हो! तुम हर जगह मेरे बारे में निश्चित हो सकते हो। ब्रह्मांड और गगन-मंडल मेरे महान सामर्थ्य को फैला रहे हैं। मैंने जो वचन बोले हैं, वे मौसम के गर्म होने, जलवायु-परिवर्तन, लोगों के भीतर की विसंगतियों, सामाजिक गतिशीलता के विकार और लोगों के हृदयों के भीतर के छल में सच हो गए हैं। सूरज सफेद हो जाता है और चंद्रमा लाल हो जाता है; यह सब संतुलन से बाहर है। क्या तुम लोग सचमुच अभी भी इन्हें नहीं देखते?

परमेश्वर का महान सामर्थ्य यहाँ प्रकट है। निस्संदेह वही एक सच्चा परमेश्वर है—सर्वशक्तिमान—जिसका लोगों ने कई वर्षों तक अनुसरण किया है! केवल शब्द बोलकर कौन चीज़ों को अस्तित्व में ला सकता है? केवल हमारा सर्वशक्तिमान परमेश्वर। जैसे ही वह बोलता है, सत्य प्रकट हो जाता है। तुम कैसे नहीं कह सकते कि वही सच्चा परमेश्वर है?

— “आरंभ में मसीह के कथन” के ‘अध्याय 39’ से उद्धृत

आज, मैं न केवल उस बड़े लाल अजगर के राष्ट्र के ऊपर उतर रहा हूँ, बल्कि मैं पूरे विश्व की ओर भी मुड़ रहा हूँ, जिससे पूरा उच्चतम स्वर्ग कांप रहा है। क्या ऐसा कोई स्थान है जो मेरे न्याय से होकर नहीं गुज़रता है? क्या ऐसा कोई स्थान है जो उन विपत्तियों के अंतर्गत नहीं आता है जिसे मैं नीचे भेजता हूँ। मैं जहाँ कहीं भी जाता हूँ वहाँ मैं हर प्रकार के “विनाश के बीजों” को छितरा देता हूँ। यह एक तरीका है जिसके तहत मैं काम करता हूँ, और यह निःसन्देह मनुष्य के उद्धार का एक कार्य है, और जो मैं उसको देता हूँ वह अब भी एक प्रकार का प्रेम है। मैं चाहता हूँ कि अधिक से अधिक लोग मेरे बारे में जानें, और ज़्यादा से ज़्यादा लोग मुझे देखने के योग्य हो सकें, और इस तरह से परमेश्वर का आदर करने के लिए आएँ जिसे उन्होंने इतने सालों से नहीं देखा है, लेकिन जो आज वास्तविक है।

— “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन” के ‘अध्याय 10’ से उद्धृत

किन्तु जब तक पुराने संसार का अस्तित्व बना रहता है, मैं अपना प्रचण्ड रोष इसके राष्ट्रों के ऊपर पूरी ज़ोर से बरसाऊंगा, समूचे ब्रह्माण्ड में खुलेआम अपनी प्रशासनिक आज्ञाएँ लागू करूँगा, और जो कोई उनका उल्लंघन करेगा, उनको ताड़ना दूँगा:

जैसे ही मैं बोलने के लिए ब्रह्माण्ड की तरफ अपना चेहरा घुमाता हूँ, सारी मानवजाति मेरी आवाज़ सुनती है, और उसके उपरांत उन सभी कार्यों को देखती है जिन्हें मैंने समूचे ब्रह्माण्ड में गढ़ा है। वे जो मेरी इच्छा के विरूद्ध खड़े होते हैं, अर्थात् जो मनुष्य के कर्मों से मेरा विरोध करते हैं, वे मेरी ताड़ना के अधीन आएँगे। मैं स्वर्ग के असंख्य तारों को लूँगा और उन्हें फिर से नया कर दूँगा, और, मेरी बदौलत, सूर्य और चन्द्रमा नये हो जाएँगे—आकाश अब और वैसा नहीं रहेगा जैसा वह था और पृथ्वी पर बेशुमार चीज़ों को फिर से नया बना दिया जाएगा। मेरे वचनों के माध्यम से सभी पूर्ण हो जाएँगे। ब्रह्माण्ड के भीतर अनेक राष्ट्रों को नए सिरे से बाँटा जाएगा और उनका स्थान मेरा राज्य लेगा, जिससे पृथ्वी पर विद्यमान राष्ट्र हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएँगे और एक राज्य बन जाएँगे जो मेरी आराधना करता है; पृथ्वी के सभी राष्ट्रों को नष्ट कर दिया जाएगा और उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। ब्रह्माण्ड के भीतर मनुष्यों में से उन सभी का, जो शैतान से संबंध रखते हैं, सर्वनाश कर दिया जाएगा, और वे सभी जो शैतान की आराधना करते हैं उन्हें मेरी जलती हुई आग के द्वारा धराशायी कर दिया जायेगा—अर्थात उनको छोड़कर जो अभी धारा के अन्तर्गत हैं, शेष सभी को राख में बदल दिया जाएगा। जब मैं बहुत-से लोगों को ताड़ना देता हूँ, तो वे जो धार्मिक संसार में हैं, मेरे कार्यों के द्वारा जीते जाने के उपरांत, भिन्न-भिन्न अंशों में, मेरे राज्य में लौट आएँगे, क्योंकि उन्होंने एक श्वेत बादल पर सवार पवित्र जन के आगमन को देख लिया होगा। सभी लोगों को उनकी किस्म के अनुसार अलग-अलग किया जाएगा, और वे अपने-अपने कार्यों के अनुरूप ताड़नाएँ प्राप्त करेंगे। वे सब जो मेरे विरुद्ध खड़े हुए हैं, नष्ट हो जाएँगे; जहाँ तक उनकी बात है, जिन्होंने पृथ्वी पर अपने कर्मों में मुझे शामिल नहीं किया है, उन्होंने जिस तरह अपने आपको दोषमुक्त किया है, उसके कारण वे पृथ्वी पर मेरे पुत्रों और मेरे लोगों के शासन के अधीन निरन्तर अस्तित्व में बने रहेंगे। मैं अपने आपको असंख्य लोगों और असंख्य राष्ट्रों के सामने प्रकट करूँगा, और अपनी वाणी से, पृथ्वी पर ज़ोर-ज़ोर से और ऊंचे तथा स्पष्ट स्वर में, अपने महा कार्य के पूरे होने की उद्घोषणा करूँगा, ताकि समस्त मानवजाति अपनी आँखों से देखे।

— “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन” के ‘अध्याय 26’ से उद्धृत



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